नई दिल्ली. हिंदू धर्म में दान करना बेहद महत्व का काम होता है. ईश्वर उन सभी लोगों को दान करने के लिए वह सब कुछ देते हैं जो वह चाहते हैं. इसलिए शक्ति अनुसार हर किसी को कुछ न कुछ दान जरूर देना चाहिए ताकि जरूरतमंदों की आवश्यकताएं भी पूरी हो सकें और आपका भी भला हो सके. हर किसी कि कुछ न कुछ मनोकामना जरूर होती है. शास्त्रों में तो स्पष्ट निर्देश है कि व्यक्ति को अपने कमाई का दशांश (दस फीसदी) अवश्य ही दान करना चाहिए, तभी उसका अपनी कमाई पर अधिकार सिद्ध होता है. शास्त्रों ने सदैव ही सत्पात्र को दान दिए जाने का आग्रह किया है. इस संबंध में शास्त्र का स्पष्ट निर्देश है कि सत्पात्रों को दिए गए दान का पुण्यफल अक्षय होता है व मृत्युपर्यंत (परलोक) भी प्राप्त होता है, वहीं कुपात्र व अयोग्य व्यक्ति को दिए गए दान का फल वर्तमान काल में भोग के उपरांत ही समाप्त हो जाता है. शास्त्रों में दस वस्तुओं के दान को महादान बताया गया है, वे निम्न हैं- गाय, भूमि, तिल, स्वर्ण (सोना), रजत (चांदी), घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, नमक (लवण).
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दान देने हेतु शास्त्रोक्त नियम
दान सदैव सत्पात्र अर्थात् दान लेने हेतु योग्य व्यक्ति को ही दिया जाना चाहिए. दान सदैव धार्मिक रीति से उपार्जित धन, संपत्ति अथवा द्रव्य का ही दिया जाना चाहिए. किसी की धरोहर या अमानत में रखे धन अथवा संपत्ति या द्रव्य का दान नहीं दिया जाना चाहिए. ऋण लेकर कभी भी दान नहीं दिया जाना चाहिए. अपने संकट काल के लिए संरक्षित धन का कभी भी दान नहीं दिया जाना चाहिए. दान सदैव प्रसन्नचित्त एवं निस्वार्थ भाव अर्थात् अपेक्षा रहित होकर दिया जाना चाहिए.
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