नई दिल्ली. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है. देवउठनी एकादशी को हरिप्रबोधिनी एकादशी और देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं. माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने के शयनकाल के बाद जागते हैं. चार महीने से रुके सभी मांगलिक कार्य भी इस दिन से शुरू हो जाते हैं और इस दिन तुलसी विवाह करने की भी परंपरा है. ऐसी मान्यताएं हैं कि भगवान विष्णु को तुलसी का वरण करने के कारण शालिग्राम का रूप लेना पड़ा था. इसलिए शालिग्राम के रूप में ही श्री हरि का विवाह भगवान विष्णु के साथ कराया जाता है. एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से परिवार पर भगवान की विशेष कृपा बनी रहती है. इसके साथ ही मां लक्ष्मी घर पर सदैव धन, संपदा और वैभव की वर्षा करती हैं.
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तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त
8 नवंबर को शाम 7:55 से रात 10 बजे तक
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तुलसी और शालिग्राम विवाह की विधि
तुलसी के पौधे को सूर्यास्त के पहले ही आंगन या छत पर रख लें. तुलसी विवाह के लिए मंडप को गन्ने से सजाएं. एक थाली में शुद्ध जल, चंदन, कुमकुम, फूल, हल्दी, अबीर, गुलाल, चावल, कलावा और अन्य पूजा की सामग्री रखें. पूजा से पहले तुलसी के गमले में शालिग्राम जी का आवाहन कर के शालिग्राम को गमले में स्थापित कर दें. पहले भगवान शालिग्राम की पूजा करें. शालिग्राम पर शुद्ध जल, चंदन, कलावा, वस्त्र, अबीर, गुलाल और फूल चढ़ाएं. इसके बाद भगवान शालिग्राम को नैवेद्य के लिए मिठाई और अन्य चीजें चढ़ाएं. इसके बाद तुलसी जी की पूजा करें. तुलसी देवी पर पूजा और सुहाग सामग्री के साथ लाल चुनरी चढ़ाएं. इसके बाद धूप-दीप दिखाकर नेवैद्य लगाएं. फिर कपूर से आरती करें और 11 बार तुलसी जी की परिक्रमा करें. तुलसी पर चढ़ाया गया सुहाग का सामान और अन्य चीजें अगले दिन किसी सुहागिन को दान कर देना चाहिए.
भगवान को जगाने के लिए इन मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए-
उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥
उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव। गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिशः॥
शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।











