आचार्य चाणक्य ने अपनी नीतियों को नीति शास्त्र यानी ‘चाणक्य नीति’ में समाहित किया है. इसके 7वें अध्याय में वो एक श्लोक के माध्यम से बताते हैं कि मनुष्य को अपने दुश्मनों को किस प्रकार परास्त करना चाहिए.
अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम्।
आत्मतुल्यबलं शत्रु विनयेन बलेन वा।।
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आचार्य चाणक्य कहते हैं कि बलवान शत्रु को उसके अनुकूल व्यवहार करके, दुष्ट शत्रु को उसके प्रतिकूल व्यवहार करके और अपने समान बल वाले शत्रु को विनय अथवा बल से वश में करना चाहिए. चाणक्य का कहना है कि शत्रु को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए और वो कैसा है, कितना बलवान है ये देखकर ही उसके प्रति आगे बढ़ना चाहिए. चाणक्य के मुताबिक सब लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार करके काम निकालना चाहिए.
यदि शत्रु हमसे अधिक शक्तिशाली है तो उसके अनुकूल चलना चाहिए, यदि दुश्मन दुष्ट या बुरा है तो उससे उलटा चलना चाहिए और अगर दुश्मन अपने समान ही शक्तिशादी है तो या तो उसे बल से जीतना चाहिए या फिर विनयपूर्वक व्यवहार करके वश में करना चाहिए. शत्रु पर विजय पाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी उसके बारे में जानकारी प्राप्त करना होता है. अगर व्यक्ति को उसके दुश्मन के बारे में पूरी जानकारी हो तो वो अपने दुश्मन को उसकी कमजोर कड़ी पर प्रहार करके आसानी से जीत हासिल कर सकता है.
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