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प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के ‘स्वयंभू ज़िम्मेदार’ लोग ‘लाल बत्ती की ललक’ में अपना नम्बर बढ़ाने में लगे हैं

Published on: June 19, 2020
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रायपुर. भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता सच्चिदानंद उपासने ने भारत-चीन सीमा विवाद पर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं के बयान पर तीखा पलटवार करते हुए कहा है कि जिस पार्टी के पूर्ववर्ती शासकों ने हमेशा चीन के सामने घुटने टेकने और भारतीय भू-भाग पर चीनी कब्ज़े की ख़बरों पर लीपीपोती करने की लाचारी दिखाई हो, उस पार्टी के नेताओं की भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर की जा रहीं टिप्पणियाँ एक बार फिर भारतीय सेना के पराक्रम और भारतीय नेतृत्व के प्रति उनकी राजनीतिक दुर्भावना की परिचय ही दे रही हैं. उन्होने कहा कि सर्जिकल और एयर स्ट्राइक के सबूत मांगने वाले और प्रधानमंत्री श्री मोदी को चुनाव में हराने के लिए पाकिस्तान से सहायता और समर्थन मांगने वाले लोग आज फिर अपनी राजनीतिक सोच की दरिद्रता का प्रदर्शन कर रहे हैं.

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श्री उपासने ने प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग को इस मुद्दे पर अपना तथ्यपरक संदर्भों का ज्ञान बढ़ाने की सलाह देते हुए कहा कि कांग्रेस बार-बार यह सवाल उठाकर अपने अल्प-ज्ञान का हास्यास्पद प्रदर्शन कर रही है कि भारतीय सैन्य अधिकारियों और सैनिकों को चीन से लड़ने के लिए निहत्थे क्यों भेजा गया? कांग्रेस के लोग हर मुद्दे पर अपनी गर्हित राजनीति से बाज नहीं आ रहे हों, यह तो समझ आता है. पर राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक राजनीति जैसे मुद्दों पर भी कांग्रेस ठीक उसी तरह तथ्यों से मुँह चुराकर देश को ग़ुमराह करने का आचरण करे, जैसा कि उरी, पुलवामा-बालाकोट और राफेल मुद्दे पर उसने किया था, यह समझ से परे है. उन्होने कहा कि भारतीय सैनिकों को गलवान घाटी में लड़ने नहीं भेजा गया था बल्कि वे रूटीन की गश्त पर गए थे और यह कांग्रेस समर्थित तत्कालीन देवगौड़ा सरकार के कार्यकाल के दौरान (29 नवम्बर सन् 1996) हुए एक समझौते के अनुच्छेद 6 की कण्डिका 1 के मुताबिक होता आया है.

इसी समझौते के मुताबिक दोनों सेनाएँ गश्त पर निकलती हैं. इतनी सामान्य समझ भी कांग्रेस के नेताओं में यदि नहीं है और वे मोदी-विरोध के इकलौते एजेंडे पर ही चल रहे हैं तो भारतीय सैन्य पराक्रम और विश्व मंच पर भारतीय नेतृत्व पर सवाल खड़े करने के इस घोर अपराध की कांग्रेस नेतृत्व को बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी. श्री उपासने ने कहा कि उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद पहले सर्जिकल और फिर बालाकोट एयर स्ट्राइक कर भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने मज़बूत इरादे जता दिए हैं और चीन के ताज़ा हमले के बाद भी उन्होंने यह साफ़ शब्दों में कह दिया है कि हमारे जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी.

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उन्होने कहा कि अब कांग्रेस इस बात का ज़वाब दे कि 2008 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना (सीपीसी) के तत्कालीन महासचिव शी जिनपिंग और भारतीय कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव राहुल गांधी के बीच कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी की मौज़ूदगी में हुए एमओयू का क्या मतलब है? दो देशों में सरकारी स्तर पर किसी तरह के एमओयू की बात तो समझ आती है, पर ‘दो अलग-अलग देशों के राजनीतिक दलों में महासचिव स्तर का’ यह कैसा एमओयू हुआ था? क्या इसका यह साफ़ संकेत नहीं कि राफेल मुद्दे के बाद कांग्रेस का नेतृत्व सीमा विवाद पर चीन के इशारों पर भारत को ग़ुमराह करने पर आमादा है? ख़ुद को भारतीय सेना के साथ खड़ा बताने का दावा कर रही कांग्रेस अपने प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के उस बयान का क्या ज़वाब देगी जिसमें लद्दाख झड़प के लिए चीन को क़ुसूरवार ठहराने के बजाय मोदी सरकार पर इसकी ज़िम्मेदारी डाली गई है.

श्री उपासने ने कहा कि उरी, पुलवामा और राफेल मुद्दों को लेकर कांग्रेस ने जिस तरह का आचरण देश में प्रदर्शित किया था, आज कांग्रेस एक बार फिर उसी राह पर चलती नज़र आ रही है. यह देश के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. प्रदेश कांग्रेस नेताओं और सत्ताधीशों की नियति ही यही रह गई है कि वे केंद्रीय स्तर पर एक परिवार की चापलूसी करके अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाएँ और प्रदेशिक स्तर पर मुख्यमंत्री की हर बेसिर-पैर की बातों पर सुर में सुर मिलाएँ ताकि निगम-मंडलों में उन्हें भी लाल बत्ती का सुख मिल सके. प्रदेश कांग्रेस के संचार विभाग के स्वयंभू ‘ज़िम्मेदार’ लोग आजकल इसी ललक के चलते भाजपा नेतृत्व को सीख देने और प्रदेश भाजपा नेतृत्व की हैसियत नापने की कोशिश में आकाश की ओर मुँह करके थूकने की चेष्टा कर रहे हैं.

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श्री उपासने ने कहा कि भाजपा नेताओं की हैसियत का अंदाजा लगाने से पहले पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की देश की जनता की नजर में क्या हैसियत है, इस बात पर मंथन करने पर कांग्रेस संचार विभाग प्रमुख को स्वयं अपनी, अपने नेता राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी की हैसियत का अंदाजा लग जाएगा. श्री उपासने ने कटाक्ष किया कि कांग्रेस संचार विभाग प्रमुख की यह मजबूरी हो सकती है कि शायद वह भी ‘लाल बत्ती की ललक’ में निगम-मंडल की अभिलाषा लिए अपने नेताओं के सामने अपना नम्बर बढ़ाने ऐसी बयानबाज़ी कर रहे हैं. पर विडम्बना ही है कि 18 महीने बाद भी कांग्रेस अपने बयानवीर की हैसियत निगम-मंडल के लायक नहीं समझ रही है.
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