केपी साहू, संपादक छत्तीसगढ़ जनादेश
वर्तमान समय में वैश्विक महामारी कोरोना का सर्वाधिक प्रभाव नई पीढ़ियों पर पड़ रहा है. सामान्य परिस्थितियों में अभी तक स्कूल-कॉलेज खुल जाते और नौनिहालों का स्वागत होता रहता किन्तु कोरोना ने सत्र 2020-21 को असमंजस में डाल दिया है. यद्यपि अभी वर्चुअल कक्षाओं के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था बनाए जाने की तैयारियां चल रही हैं, तथापि बहुत-से ऐसे बिन्दु हैं जिन पर विचार किया जाना जरूरी प्रतीत हो रहा है. छत्तीसगढ़ सरकार ने ‘पढ़ई तुंहर दुआर’ पोर्टल से ऑनलाइन पढ़ाई की शुरुआत कर दी है. शिक्षा विभाग ने वर्चुअल कक्षाओं के लिए भी विकल्प तलाशा है. कोविड-19 जैसी विषम परिस्थिति में यह उचित भी है कि फिजिकल और सोशल डिस्टेन्सिंग रखते हुए आगे बढ़ा जाए, पर सवाल यह है कि क्या ऑनलाइन क्लास नियमित कक्षाओं की बेहतर विकल्प हो सकती हैं?
हमारे नीति निर्धारकों ने हमेशा शिक्षा के क्षेत्र की उपेक्षा की है, परिणामस्वरूप हमारी पीढ़ियां उसका भुगतान कर रही हैं. विगत सत्र में छत्तीसगढ़ में ‘दीक्षा’ ऐप के माध्यम से स्कूली पाठ्यक्रम को ऑनलाइन करने की कवायद की गई थी लेकिन वह पूर्ण नहीं हो पाई थी. ऐसे में यह सर्वविदित है कि ऑनलाइन पढ़ाई का लाभ किसको मिलने वाला है? क्या हमारे ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब परिवार के बच्चे स्मार्टफोन और डाटा पर रुपए खर्च करने की स्थिति में हैं? वैज्ञानिक प्रगति के तमाम दावों के बावजूद अभी भी जबकि ग्रामीण इलाकों में अभी भी सामान्यतः नेटवर्क की समस्या बनी हुई है तो जूम ऐप कैसे काम करेगा? हाँ, शहरी क्षेत्रों के सुविधासम्पन्न वर्ग में यह अभियान लोकप्रिय और उपयोगी साबित हो सकता है पर क्या गरीब बच्चे जिनके लिए शिक्षा का अधिकार एक अधिनियम के रूप में आया था, उनके लिए यह व्यवस्था उतनी ही उपयोगी साबित हो पाएगी?
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इसी बात पर दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील अशोक अग्रवाल ने भी ‘शिक्षा का अधिकार फोरम’ की ओर से “कोविड-19 के दौरान राज्यों के अनुभव, विद्यालयों का पुनरारंभ, शिक्षा शुल्क की पेचीदगियां और डिजिटल पढ़ाई” विषय पर आयोजित शिक्षा-विमर्श पर प्रकाश डाला है. उन्होंने बताया कि ऑनलाइन पढ़ाई की प्रक्रिया की जटिलताओं के साथ तालमेल बैठाना हरेक बच्चे, अभिभावक और शिक्षक के वश में नहीं है. वस्तुतः पाठ्यक्रम में बदलाव करके डिजिटल शिक्षा का सुझाव देने वाले एक नया शिक्षा-बाजार बनाने का स्वप्न देख रहे हैं जहां गरीबों, ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की पैठ नहीं होगी. वे नए माध्यम पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं. इधर, ऑनस्क्रीन समय में वृद्धि के कारण मानसिक और अन्य शारीरिक समस्याएं उपजी हैं.
नेत्र रोग विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार टेलीविजन, कम्प्यूटर या मोबाइल स्क्रीन पर आँखें गड़ाए रहने से ‘मायनस मायोपिया’ का खतरा बढ़ जाता है, वहीं मानसिक तनाव में भी बढ़ोत्तरी होती है. बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति एवं असहिष्णुता बढ़ती है. ऑनलाइन पढ़ाई के बाद बच्चों के व्यवहार में बदलाव भी रेखांकित किया जा रहा है. उनमें चिड़चिड़ापन बढ़ा है. डॉक्टरों का कहना है कि छोटे बच्चों को ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दूर ही रखना चाहिए लेकिन अभी अनेक नामीगिरामी स्कूलों की नर्सरी क्लास की ऑनलाइन पढ़ाई भी चालू हो गई है. इस प्रकार हम कोविड-19 का नाम लेकर अपने बच्चों को दूसरी बड़ी उलझनों में झोंकने की तैयारी कर रहे हैं. ‘पढ़ाई तुंहर दुआर’ योजना महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के लिए एक अच्छा विकल्प तो हो सकती है पर छोटे बच्चों के लिए उपयोगी साबित नहीं हो पाएगी. कोरोना के कारण से उनका स्वाभाविक बचपना छीनना हमारा अधिकार नहीं है. हम उनके बचपन को सही एवं संतुलित दिशा देने के लिए अतिरिक्त प्रयास करें.
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अपने शाला-परिसरों को और अधिक स्वच्छ और साफ बनाएं. कक्षाओं को वायरस-रोधी बनाने के लिए प्रयास करें. शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का विस्तार करने की ठोस व कारगर योजना बनाए. फिलहाल अगस्त के बाद सत्र प्रारम्भ करने का निर्णय स्वागतेय है. ग्राम पंचायतों की प्राथमिक स्कूलों के संचालन में भागीदारी सुनिश्चित करें ताकि वे अपने नौनिहालों के भविष्य के प्रति जागरूक हों. स्कूलों में बड़ी स्क्रीन का उपयोग किया जाए. शिक्षक अपने बच्चों के प्रति अतिरिक्त संवेदनशील बनें तभी कोविड-19 जैसी विषम परिस्थिति में नई पीढ़ियां मानवीय संवेदना को अनुभव कर पाएंगीं, अन्यथा डिजिटल पढ़ाई पूरी कर वे भी मशीनीकृत मानव के रूप में संवेदनाशून्य बनेंगे तथा डिजिटल पढ़ाई का कोई सुखद परिणाम नहीं मिलेगा.











