विष्णुचंद्र शर्मा
जहॉं परिवार के मुखिया की मौत होती है तो लोगों को वहां सिर्फ मातम ही दिखाई देता है, परंतु अथाह गहराई में छिपा दर्द किसी को दिखाई नहीं देता.
दाऊजी! क्या आपने कभी जानना चाहा है कि कितनी सूनी सूनी आंखें वर्षों तक बिछड़े हुए के आने की प्रतीक्षा कर रही होती हैं? फुर्सत मिले तो कभी झांक कर देख लेना उस माँ की आंखों को जिसने नौनिहाल के लिए सपने सजाए थे, पर अब वे आंसुओं की धार के साथ बह रहे हैं. दाऊजी, थाम लीजिए उन आंसुओं को! फिर से सजा दीजिए उन सपनों को! दाऊजी, नवा छत्तीसगढ़ गढ़ने के इस दौर में हम बहुत कुछ नया देख रहे हैं, हां अब तक जनसंख्या गणना और चुनावी कार्यों में शिक्षकों को देखा था, पर अब तो कहीं लाश गिनने में तो कहीं पॉजिटिव पर्सन की कांट्रेक्ट ट्रेसिंग में भी देख रहे हैं.
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फ्रंटलाइन वारियर्स की श्रेणी में रखे बिना शिक्षकों की ड्यूटी कोरोना संक्रमण से मृत रोगियों के शव को लाने-ले-जाने, कोरोना संक्रमित व्यक्तियों के बीच जाकर ट्रेसिंग करने, वैक्सीनेशन, कोरोना जांच के अलावा चेकपोस्ट और संक्रमण का माध्यम बनने वाले मोहल्ला क्लास चलाने जैसे कार्यों में भी देखी जा रही है. स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव आलोक शुक्ला ने तो कहा था कि हमने ड्यूटी ना लगाने के निर्देश दिए थे, तो फिर संक्रमण के स्थानों में बिना किसी सुरक्षा कवच के यह ड्यूटी आखिर लगवाई किसने?
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दाऊजी, बहुत कठिन होता है जब एक ओर कर्तव्य परायणता और दूसरी ओर तेजी से बढ़ रहे संक्रमण से जूझने की जवाबदारी हो, बहुत कठिन होता है जब एक और कुआं और दूसरी ओर खाई हो! सचिवों से नहीं तो अपने निजी सलाहकारों से चर्चा कर उन वीरों को फ्रंटलाइन कोरोना वारियर्स को मिलने वाले बीमा का लाभ तो दिलवा दीजिए, जिन्होंने संक्रमण के बीच छाती तान कर लड़ते-लड़ते अपनी जान गवा दी! वे तो नहीं लौटेंगे पर जिंदा कर दीजिए उन परिवारों के सपनों को जो मुखिया के बिछड़ने के गम में मृतप्राय हो चुके हैं.











