अनिल पुरोहित, वरिष्ठ पत्रकार
अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर हाल के वर्षों में कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल और तथाकथित मानवाधिकारवादियों व अवार्ड वापसी ग़िरोह ने मोर्चा खोलकर देशद्रोही नारों को भी अभिव्यक्ति की आज़ादी बताने का जो शर्मनाक और कलंकपूर्ण दौर भारतीय राजनीति में चलाया है, उसने इन तमाम ग़िरोहबंद लोगों के देशविरोधी चरित्र का परिचय तो दिया ही था, पर अब दोहरे मापदंडों ने भी उनको बेनक़ाब करने में कोई क़सर बाकी नहीं रखी है. जो लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी के ढोलची बने फिर रहे थे, सत्ता की लोलुपता ने उनको आज इस स्थिति में ला खड़ा किया है कि अब वे कलम की नोक को कुचलने में भी गुरेज़ नहीं कर रहे हैं. सत्ता की राजनीति का यह स्थायी चरित्र है कि उसे आलोचना और अपनी मनमानियों पर नकेल कसा जाना रास नहीं आता.
छत्तीसगढ़ में डेढ़ दशक की मशक्कत के बाद बिल्ली के भाग्य से छीका टूटने से सत्ता पर क़ाबिज हुई कांग्रेस इन दिनों इसी राजनीतिक चरित्र को जी रही है. वैचारिक असहमति लोकतंत्र को जीवंत बनाती है, लेकिन असहमति को अपने सत्तावादी अहंकार में चूर लोगों की समझ को पाला पड़ते देर नहीं लगती और तब एक हिंसक गुंडाराज की ज़मीन पर आतंकी अट्टहास के कोहराम में लोकतंत्र और उससे जुड़ी सभी संस्थाओं/व्यक्तियों की आवाज़ घुटकर रह जाती है. विडंबना तो यह है कि सत्ता अपने तईं इन आवाज़ों को सुनने, सुरक्षा देने के तमाम दावे करती है, पर जब बारी इस कसौटी पर ख़ुद को कसने की आती है, तब धैर्य, सुरक्षा के वादे और सहिष्णुता का सारा धरातल दरकने लग जाता है. तब जो भी सच का आईना दिखाने का साहस करता है, सरकार अपने तईं उसे क़ानून का भय दिखाकर और सत्ता की चौखट में कुकुरमुत्तों की तरह उग आने वाले गुर्गे उसे हिंसा करके चुप कराने का आपराधिक कृत्य करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते.
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डेढ़ दशक का वनवास भोगकर छत्तीसगढ़ की सत्ता में लौटी कांग्रेस और प्रदेश सरकार के इसी राजनीतिक चरित्र का वीभत्स प्रदर्शन हाल ही आदिवासी बहुल बस्तर संभाग के कांकेर में देखने को मिला है, जहाँ कांग्रेसी पार्षदों और पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष ने एक पत्रकार को सरेआम बेदम पीटा. कुछ देर पहले ही एक पत्रकार से मारपीट के मामले में कोतवाली थाना में शिकायत दर्ज कर निकले पत्रकारों पर कांग्रेस से जुड़े लोगों का हमला होना क्या यह साबित नहीं करता है कि कांग्रेस राज की आड़ में गुंडाराज की स्थापना हो गई है? सवाल यह भी है कि क्या अब इस आदिवासी अंचल में जो सच लिखेगा, वह मारा जाएगा? आख़िर सत्ता की चौखट पर जीभ लपलपाते लोगों को ऐसे गुंडाराज का लाइसेंस किसने दिया है?
फिर छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के लिए सुरक्षा क़ानून बनाने का ढोल पीटती इस सरकार के कार्यकाल की काँकेर में पत्रकार के साथ हुई हिंसा प्रदेश की कोई पहली वारदात नहीं है. और तो और, ख़ुद सरकार ने क़ानून की आड़ लेकर राजनांदगांव ज़िले के मांगीलाल अग्रवाल और महासमुंद के पत्रकार दिलीप शर्मा के साथ क्या किया था, प्रदेश इसका साक्षी है. इसलिए सत्ता के चरित्र और उसकी भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में जब से कांग्रेस सत्ता में आई है, हर तरह के माफिया सरकारी संरक्षण में आएदिन किसी-न-किसी को प्रताड़ित कर ही रहे हैं और अब तो सरेआम पत्रकारों पर भी हमला होने लगा है. लूट-खसोट और उत्पीड़न के लाइसेंसधारी गुर्गों और क़ानून-व्यवस्था का सरेआम चौराहे पर चीरहरण करते सत्ता के प्रासाद में पलते दुर्योधनों-दुशासनों की फ़ौज प्रदेश में जिस तरह अराजकता का माहौल बना रही है, उससे जनता में दहशत फैल रही है.
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पर, इससे भी ज़्यादा शर्मनाक बात तो यह है कि बजाय इन घटनाओं को एक सबक के तौर पर लेकर इन घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए संकल्पित होने के, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने यह कहकर पत्रकारों को चुप कराने की शर्मनाक कोशिश की कि ‘आज पत्रकार कम-से-कम ताल ठोककर कह तो रहे हैं कि भूपेश हम आ रहे हैं. यही प्रजातंत्र है.’ ज़ाहिर है कि मुख्यमंत्री प्रदेश की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार पर कटाक्ष कर रहे थे, लेकिन सवाल यह है कि पुरानी घटनाओं को लेकर प्रलाप करके मुख्यमंत्री बघेल क्या हाल की कांकेर की घटना को जस्टीफाई करने और छिपे तौर पर पत्रकारों को धमकाने की कोशिश कर रहे हैं?
अभिव्यक्ति की आज़ादी का झंडा लेकर देशभर में हंगामा मचाने वाली कांग्रेस के मुख्यमंत्री का यह बयान नितांत ग़ैर ज़िम्मेदाराना मानने में किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए क्योंकि यह अभिव्यक्ति को कुचलने की सामंती फ़ितरत का निंदनीय प्रदर्शन है. बात-बेबात प्रदेश के जागरूक जनप्रतिनिधियों, पत्रकारों, सभ्य व अमन-पसंद क़ानून-व्यवस्था में विश्वास रखने वालों पर जानलेवा हमला करके भय, हिंसा और आतंक का राज चला रहे आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को संरक्षण देकर क़ानून के राज पर लोगों के भरोसे को तोड़ने का जो दौर प्रदेश में इन दिनों दिख रहा है, उससे क्या यह संदेश प्रतिध्वनित नहीं हो रहा है कि प्रदेश के नागरिकों की सुरक्षा के शासन-प्रशासन के तमाम दावे सिर्फ़ हवा-हवाई हैं और यह प्रदेश सरकार जनता की, जनता के लिए और जनता के साथ कहीं भी खड़ी नज़र नहीं आ रही है, क़ानून-व्यवस्था को चुनौती देते माफियाओं की संरक्षक हो गई है. यह बात सरकार को अच्छी तरह समझ लेना होगा कि दोहरे राजनीतिक चरित्र के साथ सत्ता की राजनीति लंबे समय तक न चली है और न चलेगी.
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