महासमुंद. मनरेगा योजना के तहत ग्रामीणों को रोजगार तो दिया जा रहा है पर कर्मचारियों तथा जिम्मेदार अधिकारियों के बीच बनी आपसी सांठगांठ से ग्रामीणों को उनकी मेहनत का पूरा पूरा पैसा नहीं मिल पाता. वहीं चंद चतुर लोग बिना मेहनत किए भी ग्रामीणों के हक़ में डाका डालते देखे जा रहे हैं. मनरेगा योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा फर्जी मस्टररोल, आर्थिक अनियमितता एवं अन्य गड़बड़ियों को लेकर ‘छत्तीसगढ़ जनादेश’ ने कई मर्तबा आवाज बुलंद की है. पर जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा किसी प्रकार की कार्रवाई ना करना, ना सिर्फ गड़बड़ी को बढ़ावा दे रहा है वरन् जड़ों तक फैले भ्रष्टाचार को भी साबित कर रहा है.
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उल्लेखनीय होगा कि बागबाहरा विकासखंड की ग्राम पंचायत बोड़रीदादर में 11 सितंबर 2018 को 2.69 लाख स्वीकृत कर किसान धनवार की निजी भूमि पर मनरेगा योजना के तहत डबरी निर्माण किया जाना था. वहीं फाइलों की मानें तो 2.51 लाख मजदूरी एवं 18 हजार रुपए सामग्री लागत यह दर्शाते हुए ग्राम पंचायत द्वारा एजेंसी के रूप में यह कार्य कर भी दिया गया. तकनीकी सहायक केदार दीवान एवं लोकपाल जितेंद्र साहू की देखरेख में डबरी निर्माण होना सूचना पटल पर दर्शाया भी गया है. इतना ही नहीं यह भी उल्लेख है कि डबरी निर्माण कार्य का सत्यापन सामाजिक अंकेक्षण अधिकारी लोकेश त्रिपाठी द्वारा किया गया. यह तो हुई फाइलों की बात अब हम चलते हैं ग्राम बोड़रीदादर, जहां डबरी का निर्माण फाइलों में दर्शाया गया है. पर यह क्या? यहां तो डबरी के नाम पर छोटा सा गड्ढा भी दिखाई नहीं दे रहा? मतलब साफ है कि यहां डबरी निर्माण कराया ही नहीं गया या फिर डबरी ही चोरी हो गई?
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दरअसल, तो शासन की आंख में धूल झोंकी जा रही है और अधिकारी कर्मचारी तथा कुछ जनप्रतिनिधि मिलकर ग्रामीणों के हक़ पर डाका डालते हुए अपनी पॉकेट गर्म कर रहे हैं. वास्तविकता यह है कि जिस किसान की भूमि पर डबरी का निर्माण होना था, वह हुआ ही नहीं है. मतलब फर्जी मस्टररोल तैयार करते हुए सरकारी राशि की बंदरबांट की गई है. यह तो महज एक नमूना है, दरअसल तो जिले भर में ना जाने ऐसे कितने कारनामे कर लिए गए. ताज्जुब है कि सरासर हो रही इस बंदरबांट पर भी जिम्मेदार अधिकारी खामोश बैठे रहते हैं, तो क्या यह सब कुछ उनकी जानकारी में हुआ है? यदि नहीं तो फिर उचित जांच करवा कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही?







