नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सभी धर्मों में लड़कियों की शादी की उम्र लड़कों के समान करने की याचिका को खारिज कर दिया है. चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि संविधान के रक्षक के तौर पर देश के सुप्रीम कोर्ट के पास कोई विशेष अधिकार नहीं है. संविधान की रक्षा के लिए संसदके पास भी उतना ही अधिकार है. संसद के पास अधिकार है कि वो किसी भी कानून में संशोधन कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में किसी तरह का निर्देश देने से साफ इनकार कर दिया. सभी धर्मों में लड़कियों की शादी की उम्र लड़कों के बराबर 21 साल करने की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज करते हुए कहा कि ये कानून में संशोधन करने का मामला है.
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ऐसे में सुप्रीम कोर्ट इस मामले में संसद को कानून लाने के लिए आदेश नहीं दे सकता है. अगर सुप्रीम कोर्ट शादी के लिए कम से कम 18 साल की उम्र के नियम को रद्द कर देता है, तो फिर शादी के लिए कोई न्यूनतम उम्र नहीं रह जाएगी. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में याचिका दायर करने वाले बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय से कहा कि ये कोई राजनीतिक मंच नहीं है. हमें ये मत सिखाइए कि संविधान के रक्षक के तौर पर हमें क्या करना चाहिए. बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट में लड़के और लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र एक बराबर करने के लिए पहले एक याचिका दायर की गई थी. बाद में हाई कोर्ट ने इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट के पास भेज दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को 13 जनवरी को अपने पास मंगा लिया था.
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