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‘कोर्ट संसद को कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकता’

Published on: October 18, 2022
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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में कहा है कि संसद कानून बनाने के लिए संप्रभु अधिकार का प्रयोग करती है और कोई भी बाहरी प्राधिकार इसे कानून बनाने का निर्देश जारी नहीं कर सकती है. इस मामले की संजीदगी को देखते हुए विभिन्न धर्मों के पर्सनल लॉ के अध्ययन की जरूरत है. इसी वजह से केंद्र सरकार के अनुरोध पर 21वें लॉ कमीशन ने विभिन्न स्टेकहोल्डर्स से राय मंगवा कर पर्सनल लॉ का अध्ययन किया और रिफॉर्म ऑफ फैमिली लॉ के नाम से एक  कंसल्टेशन पेपर अपनी वेबसाइट पर अपलोड किया है.21वें लॉ कमीशन का कार्यकाल चूंकि खत्म हो चुका है. इसलिए नए 22वें लॉ कमीशन के सदस्यों की नियुक्ति के बाद ये मसला उनके सामने रखा गया.

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लॉ कमीशन की रिपोर्ट के बाद सरकार तमाम स्टेक होल्डर्स से सलाह-मशविरा करेगी. भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर याचिका में शादी, तलाक, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार के लिए सभी धर्मों के लिए एक समान कानून लागू करने की मांग की गई है. सरकार का हलफनामा यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर दायर याचिकाओं और उस बारे में कोर्ट के दखल देने के खिलाफ तो है, पर यूनिफॉर्म सिविल कोड के खिलाफ भी है, ऐसा नहीं कहा जा सकता है. हलफनामे में एक जगह आर्टिकल 44 के तहत नीति निर्देशक तत्वों का हवाला देते हुए सरकार ने कहा है कि विभिन्न धर्मों/ समुदायों के कानून देश की एकता के खिलाफ है. इस लिहाज से सरकार ने लॉ कमीशन और अपने स्तर पर विभिन्न स्टेक होल्डर्स से रायशुमारी और अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ के अध्ययन की जरूरत बताई है.

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