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‘नक्सलवाद के ख़िलाफ़ सरकार डींगें तो बड़ी-बड़ी हाँक रही, पर उनके उन्मूलन के लिए ज़रा भी ईमानदार नहीं’

Published on: January 18, 2021
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रायपुर. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नक्सल पीड़ित परिवारों व आत्म समर्पित नक्सलियों को शासन की योजनाओं का लाभ नहीं मिलने पर प्रदेश सरकार की नीयत और नीति पर सवाल खड़ा किया है और कहा है कि नक्सलवाद के ख़िलाफ़ प्रदेश सरकार डींगें तो ख़ूब बड़ी-बड़ी हाँकती है, पर नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए वह ज़रा भी ईमानदार नज़र नहीं आ रही है. उन्होने कहा कि वर्ष 2004 में बनी नक्सल पीड़ित पुनर्वास कार्ययोजना के तहत घोषित सुविधाओं से वंचित लगभग 500 परिवारों का राजधानी आकर गुहार लगाना प्रदेश सरकार के ढोल की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है.

डॉ. सिंह ने कहा कि 2004 में भाजपा की प्रदेश सरकार के कार्यकाल में बनाई गई इस कार्ययोजना में पीड़ित परिवारों के लिए शासकीय नौकरी, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा आर्थिक सहायता, शहरी क्षेत्र में नि:शुल्क आवास, परिवार के दो बच्चों के लिए कक्षा 1 से 12 तक छात्रवृत्ति, एक रुपए में राशन कार्ड, बस यात्रा भाड़ा में 50 फीसदी की रियायत, ज़मीन के बदले ज़मीन, स्वरोज़गार के लिए आवासीय परिसर में नि:शुल्क दुकान और इसके लिए केंद्र व राज्य सरकारों से अनुदान देने के अलावा और भी कई प्रावधान किए गए थे. लेकिन मौज़ूदा प्रदेश सरकार नक्सल पीड़ित और आत्मसमर्पित नक्सलियों को ये सुविधाएँ देने में बदनीयती का परिचय दे रही है. उन्होने कहा कि राजनांदगाँव ज़िले के 40 नक्सल पीड़ित परिवारों ने उच्च न्यायालय में सन 2019 में याचिका दाख़िल की थी, जिस पर हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव (गृह), पुलिस महानिदेशक, कलेक्टर, एसपी, सहा. आयुक्त ट्राइबल विभाग को पीड़ित परिवारों को शासन द्वारा घोषित सभी सुविधाएँ मुहैया कराने का आदेश दिया था.

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लेकिन उच्च न्यायालय के आदेश के बावज़ूद राजनांगाँव ज़िला प्रशासन ने कुछेक खानापूर्ति करने के अलावा अब तक कोई सार्थक पहल इस दिशा में नहीं की है. डॉ. सिंह ने कहा कि रविवार को कांकेर, कोण्डागांव, नारायणपुर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा से राजधानी पहुँचे 500 से ज़्यादा नक्सल पीड़ित परिवारों ने शासन की योजनाओं का लाभ न मिलने का आरोप लगाया और कहा कि उन्होंने शासन की योजनाओं से आकर्षित होकर समर्पण किया था और समाज की मुख्य धारा से जुड़े थे. उस दौरान बोला गया था कि परिवार के लोगों को शासन की पुनर्वास योजना का लाभ मिलेगा. लेकिन उन्हें योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है. कुछ ग्रामीण सरकार के लिए मुखबिरी करते थे जिन्हें नक्सलियों द्वारा पहचान लिया गया. अब उन्हें नौकरी से नहीं निकालने की मांग भी इन पीड़ित परिवारों ने की है.

उन्होने कहा कि पुनर्वास योजना का लाभ देने की मांग लेकर राजधानी पहुँचे इन पीड़ित परिवारों ने प्रदेश के गृह मंत्री से मुलाक़ात करने की कोशिश की, पर सफल नहीं हुए. बाद में प्रेस को जारी अपने पत्र में आत्मसमर्पित नक्सलियों ने पुनर्वास योजना के लाभ की मांग पर ज़ोर दिया है. इन परिवारों का आरोप है कि उन्हें अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिल रही है. जिन परिवार के लोग नक्सल हिंसा में मारे गए हैं, वे चाहते हैं कि उन्हें पुनर्वास नीति के तहत सुविधाओं का लाभ दिया जाए और मुखबिर चाहते हैं कि उन्हें नौकरी से न निकाला जाए. डॉ. सिंह ने कहा कि इन नक्सल पीड़ित परिवारों में कुछ सदस्य ऐसे भी हैं, जिन्हें समर्पण करने के बाद भी शासन की सुविधाओं का कोई लाभ नहीं मिला. हाईकोर्ट के आदेश के बाद सिर्फ खानापूर्ति कर राशनकार्ड बनाए गए, लेकिन छात्रवृत्ति नहीं दी गई है. मुखबिर की मृत्यु पर भारत सरकार द्वारा 3 लाख रुपए और छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा 2 लाख रुपए (कुल 5 लाख रुपए) की दी जाने वाली मदद भी उन्हें मुहैया नहीं कराई गई है.

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इसी प्रकार मुखबिर की मृत्यु के बाद उनके परिवार में किसी एक सदस्य को पात्रता के अनुसार नौकरी देने के बजाय चपरासी बना दिया गया है. डॉ. सिंह ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस की यह प्रदेश सरकार नक्सलवाद के नासूर के उन्मूलन जैसे अति संवेदनशील विषय में भी अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति ईमानदार नहीं है और नाकारापन की सारी हदें पार करती जा रही है. नक्सलियों से अपना याराना निभाने में मशगूल सरकार शासन घोषित सुविधाओं का लाभ तो नक्सल पीड़ित परिवारों को दे नहीं रही है और बड़बोलापन दिखाकर अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू बनने की हास्यास्पद नौटंकी कर रही है. छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का ख़ूनी उत्पात लगातार बढ़ता जा रहा है और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल नक्सलवाद पर सिर्फ़ चिठ्ठियाँ लिखकर अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रहे हैं.

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