पिथौरा. दलित आदिवासी मंच द्वारा विश्व महिला किसान दिवस 10 अक्टूबर को सुखीपाली में मनाया गया. हजारों की संख्या में महिला-पुरुष इस कार्यक्रम में शामिल हुए. इस कार्यक्रम को प्रत्येक गांव से चुनी हुई महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. मंच द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार इस कार्यक्रम में महिलाओं ने खुलकर अपनी बात रखीं. महिला वक्ताओं ने कहा कि हम महिलाएं 90 प्रतिशत खेती-किसानी में काम करती हैं. वनोपज संग्रह करना एवं बेचने का काम करती हैं. जड़ी-बूटी औषधियों का जंगल से आहरण करती हैं लेकिन न हमें किसान का दर्जा दिया जाता है और न हमें महिला वैद्य का दर्जा दिया जाता है.
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वनाधिकार कानून बने 15 साल हो गए पर आज भी हम वनाधिकार कानून से वंचित हैं. सामुदायिक वनाधिकार का तो आज तक किसी गांव में पहल ही नहीं हुआ है. जहां तक हम लोग निस्तारी करते हैं. आज वन विभाग द्वारा पूरा घेराबंदी हो चुका है. एक तरफ सरकार कानून बनाती है. पारम्परिक रूप से वनों में निवासरत लोगों का वनाधिकार कानून के तहत मान्यता प्राप्त करने की देश में यह पहला कानून है जो महिला-पुरुष को समान दर्जा देते हुए महिला-पुरुष दोनों के नाम पर वनाधिकार पत्र जारी करता है.
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दलित आदिवासी मंच की संयोजिका राजिम केतवास ने कहा कि सरकार तो कानून बना देती है और यह भी महसूस करती है कि वनों में रहने वाले पारम्परिक रूप से जीवन बिताने वाले लोगों के साथ अन्याय हुआ है उस अन्याय को सुधारने के लिए यह कानून बनाया गया है लेकिन धरातल पर उस कानून को अमल नहीं किया जा रहा है. आज भी वन विभाग गुण्डाराज गांव वालों के साथ अपना रहा है. हर दूसरे दिन में लोगों को धमकाना, पीओआर करना तथा जेल की धमकी देना उनका रवैया रहा है. कार्यक्रम में बसना विधायक देवेन्द्र बहादुर सिंह अध्यक्ष छत्तीसगढ़ वन विकास निगम भी उपस्थित थे.
महिलाओं ने विधायक से मांगे अधिकार
कार्यक्रम के दौरान महिला वक्ताओं ने विधायक के समक्ष अपने अधिकार मांगते हुए कहा कि वनाधिकार कानून मान्यता पत्र में महिलाओं का नाम पहले लिखा जाए. वनाधिकार मान्यता अधिनियम में जो दावे महिलाओं के नाम पर हुए हैं उन्हें शीघ्र मंजूर किया जाए. वनोपज उत्पादनों के राज्य संघ द्वारा पुनः मूल्य में बढ़ोतरी की जाए, जिला स्तरीय समिति द्वारा निरस्त दावों की पुनः समीक्षा की जाए एवं प्रत्येक पंचायत में नोटिस निकालकर विशेष ग्राम सभा कर पुन: दावा भराया जाए. सरकार द्वारा समय-समय पर वनाधिकार कमेटी एवं प्रशासनिक स्तर पर प्रशिक्षण लेकर वनाधिकार कानून की बारिकी को समझाया जाए या प्रशिक्षण आयोजित करें, गांव स्तर पर निस्तारी को ध्यान देते हुए सामुदायिक वनाधिकार पर विशेष पहल की जाए.
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