राजकुमार सोनी, वरिष्ठ पत्रकार
अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी जनता कांग्रेस के सुप्रीमों हैं, लेकिन अब लगता नहीं है कि वे बहुत ज्यादा दिनों तक अपनी पार्टी के प्रमुख बने रहेंगे. प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए जनता कांग्रेस ने बसपा के साथ मिलकर कई सीटों पर जोर आजमाइश की थीं, लेकिन कांग्रेस के जोरदार प्रदर्शन ने उन्हें शक्ति का केंद्र बनने का कोई मौका नहीं दिया. इधर, कांग्रेस के सत्ता में आते ही उनकी पार्टी के जिम्मेदार पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया है और यह सिलसिला लगातार जारी है. जब भी कोई जिम्मेदार सदस्य रुखसत होता है तो अमित जोगी का बयान आता है- वो मेरे बड़े भाई जैसे हैं. वो मेरे छोटे भाई जैसा है!
इसी जैसे-तैसे के बीच रविवार को पार्टी के विधायक देवव्रत सिंह और प्रमोद शर्मा ने साफ किया कि वे अमित जोगी की हरकतों से परेशान हैं और कांग्रेस ज्वाइन करने की इच्छा रखते हैं. दोनों विधायकों ने मरवाही चुनाव में कांग्रेस को समर्थन देने का वादा भी किया है. एक विधायक ने यह तक दावा किया है कि खुद अमित जोगी की माताश्री रेणु जोगी कांग्रेस में आना चाहती हैं. हालांकि अमित जोगी ने इस बात खंडन किया है. अभी एक रोज़ पहले जब जोगी कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक धर्मजीत ने पार्टी की तरफ से भाजपा को समर्थन देने ऐलान किया तो यह सवाल भी जोर-शोर से उठा था कि जोगी कांग्रेस ने भाजपा का समर्थन क्यों किया. कांग्रेस के एक प्रवक्ता आरपी सिंह का यह आरोप सामने आया कि भाजपा से लंबी-चौड़ी डील हुई है. प्रवक्ता के इस आरोप पर राजनीति के जानकार लोगों ने इसलिए भी भरोसा किया क्योंकि वे अंतागढ़ टेपकांड से वाकिफ थे.
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अंतागढ़ के उपचुनाव में अजीत और अमित जोगी की भूमिका सामने आने के बाद ही तब के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आरोप लगाया था कि जोगी भाजपा के लिए ही काम कर रहे थे. जब जोगी कांग्रेस का गठन हुआ तब भी राजनीति के गलियारों में यह बात तैरती रही कि यह पार्टी भाजपा की ही एक विंग है. इधर, विधायक धर्मजीत सिंह के फैसले को देवव्रत सिंह और प्रमोद शर्मा ने एक अकेले शख्स का निर्णय मानते हुए साफ किया है कि पार्टी से लोकतंत्र गायब है, तो धर्मजीत सिंह का कहना है कि देवव्रत सिंह और प्रमोद शर्मा सत्ता लोभी हैं. बहरहाल, जो भी हो…जोगी कांग्रेस में चल रही गतिविधियों से ऐसा लगने लगने लगा कि यह पार्टी छत्तीसगढ़ से जल्द ही अपना बोरिया-बिस्तर समेट लेगी.
अगर ऐसा नहीं होता है तो यह मान लेने में कोई बुराई नहीं है कि आने वाले किसी खराब समय में यह दल अपनी कोई उपयोगिता साबित करें. (फिलहाल दिल्ली दूर है) अभी तो इस दल और इसके प्रमुख की पूरी गतिविधियां पैर पर कुल्हाड़ी नहीं बल्कि कुल्हाड़ी पर पैर मारने वाली साबित हो रही है. समझदार लोगों की भाषा में इसे गंभीरता का खत्म हो जाना कहते हैं. वैसे इस पार्टी के प्रमुख को इस बात पर मंथन तो करना ही चाहिए कि लोग उनकी किसी भी बात पर भरोसा क्यों नहीं करते हैं? उनकी विश्वनीयता कमजोर क्यों है? क्या कारण है कि एक बड़े वर्ग ने उनकी पार्टी को डूबता हुआ जहाज मान लिया है? वे जगन रेड्डी या तेजस्वी यादव क्यों नहीं बन पाए? कोई भी पार्टी भरोसेमंद कार्यकर्ताओं से चलती है. अगर भरोसेमंद कार्यकर्ता ही आपके पास नहीं हैं तो फिर पार्टी का सुप्रीमों रहकर क्या कर लीजिएगा?
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