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इकलौता शिव मंदिर जहां होलिका दहन की रात लगता है मेला

Published on: March 17, 2022
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केशव पाल

रायपुर. जिले के तिल्दा ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले मोहदा गांव में हर साल होलिका दहन की रात को भव्य मेला लगता है. महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि के रूप में विख्यात मोहदेश्वर धाम मोहदा में छत्तीसगढ़ का एकमात्र ऐसा शिव मंदिर है जहां हर वर्ष होलिका दहन की रात मेले का आयोजन होता है. जहां स्वयंभू शिवलिंग का दर्शन करने भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. होलिका दहन की रात जब लोग होली की मस्ती में झूम रहे होते हैं तब दूसरी ओर उसी रात को मोहदा के मोहदेश्वर धाम में शिवलिंग का दर्शन करने भक्तों का तांता लगता है. बताया जाता है कि जब होलिका दहन की रात्रि को शिव मंदिर का पट खोला जाता है तो शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ता है. यहां आदिकाल से होलिका दहन की रात भव्य शिव मेला का आयोजन होता आ रहा है.

रायपुर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर पूरे छत्तीसगढ़ में विख्यात है. जहां छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से शिव भक्त बड़ी संख्या मे पहुंचकर यहां होलिका दहन करने के बाद यहां के रानीसागर तालाब में स्नान कर शिवलिंग की पूजा-अर्चना कर दुग्धाभिषेक, रूद्राभिषेक व जलाभिषेक करते हैं. ग्रामीणों की मानें तो यह शिवलिंग करीब दो सौ साल पहले का जान पड़ता है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां हर तरह की मनौती और मनोवांछित फल की कामना के लिए भक्त विभिन्न जिलों से आते हैं और शिवलिंग का महाभिषेक करते हैं. होली की रात मेला लगने वाले में छत्तीसगढ़ का इकलौता मोहदा का शिवमंदिर की प्रसिद्धि आज पूरे प्रदेश भर में है. इसलिए हर साल लोग यहां आने के लिए होली का इंतजार करते हैं.

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तीन बार स्वरूप बदलता है शिवलिंग

ऐसी किवदंती है कि यहां के भू-फोड़ शिवलिंग साल में तीन बार अपना रूप स्वतः ही बदलता है. हर चार माह में काले, भूरे और खुरदुरे स्वरूप में अपना रूप बदलता है। जो अपने आप में अनूठा है. जानकारों की मानें तो होलिका दहन की रात शिवलिंग का दर्शन करना काफी फलदायी माना जाता है. शायद इसी कारण छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों और अन्य राज्यों से भी हर साल बड़ी संख्या में श्रद्वालु यहां शिवलिंग का अभिषेक करने सपरिवार पहुंचते हैं. पूजा-अर्चना कर सुख समृद्धि की कामना करते हैं.

आदिकाल से लग रहा मेला

जनश्रुति के अनुसार यहां शिव मेला आदिकाल से ही हर साल होलिका दहन की रात को लगते आ रहा है. इसलिए ग्रामीण श्रद्वा भाव के साथ यहां आकर मनोवांछित फल की कामना करते हैं. ग्रामीणों की मानें तो मेला लगना यहां कब से शुरू हुआ इसकी सहीं-सहीं जानकारी किसी पास नहीं है. पूर्वजों की जमाने से यहां मेला लगते आ रहा है, इसलिए यह परंपरा आज भी जीवित है.

महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि

ऐसी मान्यता है कि महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि होने के कारण यह स्थल आज भी काफी पवित्र माना जाता है. महर्षि के तपोभूमि होने के कारण मोहदेश्वर महादेव का दर्शन काफी चमत्कारी व फलदायी माना जाता है. सावन, महाशिवरात्रि व चैत्र, क्वांर के महीनें मे भी यहां आस्था का जनसैलाब उमड़ता है. इसीलिए यहां की ख्याति दूर-दूर तक बनी हुई है.

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