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अफ़सरशाही का सामंती आचरण लोगों को कोरोना से ज़्यादा डरा रहा है!

Published on: May 27, 2021
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केपी साहू, संपादक छत्तीसगढ़ जनादेश

कोरोना से कराह रही छत्तीसगढ़ की जनता के साथ इन दिनों लॉकडाउन उल्लंघन के नाम पर प्रशासनिक अधिकारी जैसा बर्ताव कर रहे हैं, वह न तो प्रशासनिक अधिकारियों के लिए बनी सेवा संहिता के अनुरूप है और न ही छत्तीसगढ़ की संस्कृति से मेल खाता है. सरकारें तो आती-जाती रहती हैं, पर लोकतंत्र की लाख दुहाई देने के बाद भी अफ़सरशाही का सामंती आचरण हर सरकार के कार्यकाल में लोगों के संत्रास की एक बड़ी वज़ह बना ही रहता है. भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश सरकार के तीसरे कार्यकाल में जिस तरह सरकार नौकरशाह चलाने लगे थे, हालात आज कांग्रेस की सरकार के कार्यकाल में भी सुधरने के बजाय और ज़्यादा बिगड़ते नज़र आ रहे हैं.

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सूरजपुर जिले में जिस तरह जिलाधीश द्वारा एक युवक को बीच सड़क पर थप्पड़ मारने एवं मोबाइल को पटकने की घटना को अंजाम दिया गया उस घटना की जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है. आज छत्तीसगढ़ की भोली-भाली एवं शांतिप्रिय जनता को कोरोना वायरस से अधिक अधिकारियों का भय सता रहा है. सूरजपुर कलेक्टर रहे रणवीर शर्मा का पूर्व में भी विवादों से गहरा नाता रहा है. एसडीएम रहते हुए रिश्वत मामले में लिप्त पाए जाने के बावज़ूद उस अधिकारी को कलेक्टर पद पर नियुक्त करना ही छत्तीसगढ़ की जनता के साथ घोर अन्याय था. और विडंबना यह है कि अभी सूरजपुर प्रकरण के बाद भी छत्तीसगढ़ की जनता के साथ छलावा ही हुआ है क्योंकि उक्त मामले में कलेक्टर पर विधिसम्मत प्राथमिकी दर्ज कर कार्रवाई होनी थी लेकिन प्रदेश सरकार ने सजा के नाम पर सूरजपुर कलेक्टर को सिर्फ़ हटाया भर ही नहीं, बल्कि संयुक्त सचिव बनाकर एक तरह से शर्मा को उपकृत भी कर दिया है!

जब स्वयं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस घटना की निंदा करके इस तरह के कृत्य को बर्दाश्त नहीं करने की बात कह चुके हैं, तो फिर ऐसे निरंकुश कलेक्टर को केवल स्थानांतरित करना या निलंबित करना पर्याप्त सजा नहीं जान पड़ती. जानकार मानते हैं कि ऐसे अधिकारी को कभी भी कलेक्टर जैसे पद पर नियुक्त ही नहीं किया जाना चाहिए था. संविधान हमें समानता का अधिकार देता है. यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे के साथ सार्वजनिक रूप से मारपीट करता है तो उसके विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई का प्रावधान है. फिर एक अधिकारी को एक सामान्य व्यक्ति को थप्पड़ मारने का अधिकार किसने दिया. यदि कोई व्यक्ति लॉकडाउन का उल्लंघन करते पाया गया है तो उसके लिए सुसंगत धाराओं के तहत कार्रवाई होनी चाहिए.

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 यह घटना बताती है कि प्रदेश में नौकरशाही हावी है, निरंकुशता और सामंती-प्रवृत्ति के प्रशासनिक-चरित्र के चलते भी आम आदमी का इस आपदाकाल में जीना मुहाल हो गया है. और, मामले सिर्फ़ एक यही नहीं है. कलेक्टर सरेराह निर्दोष लोगों को पीटें, मुख्यमंत्री से फर्जी कोविड सेंटर का उद्घाटन करा लें, एसडीएम (महिला अधिकारी) खुलेआम अपने मातहतों को वसूली, अपने घरेलू ख़र्च और वसूली के लिए प्रताड़ित करने के लिए चर्चा का केंद्र बनें, महकमों में व्याप्त अफ़सरशाही के अहंकार में डूबे लोग मातहतों से घरेलू नौकरों का काम लें, भ्रष्टाचार जिस अफ़सरशाही की रग-रग में व्याप्त है, उसमें अपने ज़मीर के साथ काम करने वाले एक पुलिस जवान को नौकरी छोड़नी पड़े, एक अधिकारी को भ्रष्टाचार की जाँच के लिए अनशन तक करना पड़े, ये तमाम उदाहरण प्रदेश सरकार की अपनी प्रशासनिक समझ-बूझ की कमी को इंगित करने के लिए पर्याप्त हैं. सूरजपुर जैसा नितांत अलोकतांत्रिक व अमानवीय कृत्य सोशल मीडिया में वीडियो के माध्यम से देश-प्रदेश की जनता ने देखा है, तब सवाल यह उठता है कि क़दम-क़दम पर सत्तापक्ष के नेताओं द्वारा कोरोना गाइडलाइन की धज्जियाँ उड़ाते देखकर कार्रवाई करने में नौकरशाहों के हाथ-पाँव क्यों फूल जाते हैं?

महासमुंद में धारा-144 लागू होने के बावजूद जनपद परिसर से लगभग सैकड़ों लोग संसदीय सचिव के नेतृत्व में विजय जुलूस निकाल कोतवाली के सामने से कांग्रेस भवन पहुंचे थे. इसी तरह हाल ही कोंडागांव में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम के भतीजे की शादी और काँकेर ज़िले में संसदीय सचिव शिशुपाल सोरी के बेटे की शादी में कोविड प्रोटोकॉल का खुला उल्लंघन हुआ और प्रशासन के क़ानून का चाबुक कहीं नज़र नहीं आया! हैरत की बात तो यह है कि पिछले सालभर के लगभग सवा साल के कोरोनाकाल में सत्तापक्ष की मनमानियों की ओर से प्रशासन आँखें मूंदे बैठा है. सत्ता की धौंस के आगे रिरियाते प्रशासनिक अधिकारियों को क्या सरकार ने कोरोना प्रोटोकॉल के नाम पर जनता को इस प्रकार मारने-पीटने का अधिकार भी प्रदान किया है?

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यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि हमें आजादी मिले 75 साल हो गए पर हम ब्रितानी-मानसिकता वाली नौकरशाही चंगुल से अब भी मुक्त नहीं हो पाए हैं. अंग्रेज तो भारत छोड़कर चले गए, पर कुछ काले अंग्रेज सामंत रह गए हैं जो नौकरशाही के सामंती अहंकार में चूर होकर अंग्रेजों द्वारा बनाए क़ानूनों की आड़ लेकर भारतीयों को दिए जाने वाले क्रूर दंड से हमें गाहे-बगाहे रू-ब-रू कराते हैं. अंग्रेज पहले भी हमारे पूर्वजों को सार्वजनिक रूप से ज़लील करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे. निरीह जनता पर कोड़े बरसाने हों या थप्पड़ जड़ने या फिर हाथ-पैर बांधकर चमड़ी उधेड़ना हो, अंग्रेज अधिकारी ऐसी अमानवीयता को अपनी शान समझते थे. और अगर आज के अधिकारी भी वही अंग्रेज अधिकारियों का ही अनुसरण करते नज़र आ रहे हैं तो फिर हमारी आज़ादी मिलने न मिलने का औचित्य क्या रह जाता है? क्या हमारे पूर्वजों ने इसी दिन को देखने के लिए हमें आजाद कराया था? छत्तीसगढ़ में लॉकडाउन लागू हुए एक महीना से अधिक का समय हो गया.

छत्तीसगढ़ की जनता कैदियों की भांति अपने-अपने घरों में क़ैद है. किसी को राशन की ज़रूरत है, तो किसी को साग-भाजी की, तो किसी को दवाई की. अति आवश्यक काम होने पर लोग बाहर निकलने विवश होते हैं पर उसकी मज़बूरी को बिना समझे इस तरह थप्पड़ मारने, मोबाइल पटकने, सिपाहियों से पिटवाने और एफआईआर दर्ज करवाने की धमकी देना एक प्रशासनिक अधिकारी का आचरण नहीं बल्कि उसकी विकृत मानसिकता का परिचायक है. ऐसे अधिकारियों का मानसिक इलाज कराने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसे अफ़सरों के कारण हमारा लोकतंत्र अब ठोकतंत्र में तब्दील होता जा रहा है. प्रशासनिक अधिकारी जनता को बस ठोकने काम ही कर रहे हैं. कहीं कलेक्टर ठोक रहा है तो कहीं एसडीएम ठोक रहा. पुलिस वाले अलग से ठुकाई कर रहे हैं.

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