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क्रूर सत्य की अनुभूति है सुषमा जी का अनंत की यात्रा पर जाना

Published on: September 9, 2019
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अनिल पुरोहित, वरिष्ठ पत्रकार

गीता कहती है… देह वस्त्र है, जिसे पुराना समझ बदलती है… पर… मानव मन विषाद से भर ही जाता है, जब कोई अपना आदर्श और प्रिय सदा-सदा के लिए बिछुड़ता है. शब्द ढूंढ़े नहीं मिलते, मन को सांत्वना देने के लिए. हमारा स्वयं की भावना-नीरधारा के प्रवाह पर ही नियंत्रण नहीं रहता तो शेष आंखों के आंसू कौन पोंछे? आंसू थमते हैं तो स्मृतियां चलचित्र की भांति एक-एक कर आती हैं, जाती हैं… और, फिर आंसुओं में भीग जाती हैं स्मृतियां. आदरणीया सुषमा स्वराज जी का अनंत की यात्रा पर जाना ऐसे ही क्रूर सत्य की अनुभूति है. 6 अगस्त, 2019 की रात से लेकर इन पंक्तियों के लिखने तक इसी मनोदशा, इसी मनोव्यथा से जूझता रहा मैं… अपनी एक संक्षिप्त किन्तु जीवनभर की पूंजी बनी उस भेंट को साझा करना चाहता था आपसे… पर सूझ नहीं रहा था कुछ.

लगभग 22 वर्ष पहले साक्षात भेंट करने का, चर्चा करने का और लगभग एक घंटे तक साथ-साथ यात्रा करने का है यह प्रसंग. भारत की स्वतंत्रता के स्वर्ण जयंती वर्ष (सन् 1996-1997) के निमित्त भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक, शिल्पकार और रणनीतिकार परम आदरणीय श्री लालकृष्णजी आडवाणी अपनी स्वर्ण जयंती रथ यात्रा लेकर भारत के जन-मन का जागरण करने निकले थे. आदरणीया सुषमा जी शिष्य-धर्म का निर्वहन कर उस पूरी यात्रा में आदरणीय आडवाणी जी के साथ रहीं. मैं तब दैनिक भास्कर (रायपुर) में संपादकीय विभाग में कार्यरत था. अपराह्न में अखबार के तत्कालीन संपादक आदरणीय श्री रमेश नैयर जी ने मुझे बुलाया और कहा कि कल स्वर्ण जयंती रथयात्रा के साथ जाना है और श्री आडवाणी जी का साक्षात्कार अखबार के लिए लेना है.

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रोमांच से भरे इस सौभाग्य के अवसर को शायद कोई भी नहीं छोड़ता. मैंने हामी भरी और अगले दिन रायपुर से महासमुंद-बागबाहरा-पिथौरा-सराईपाली होकर ओड़िशा (तब उड़ीसा) जाने वाली रथयात्रा के साथ निकला. समय की कमी और यात्रा को नियत समय पर आगे बढ़ाने की प्रतिबध्दता के बीच अंततः बागबाहरा में हम (मैं और प्रेस के फोटोग्राफर श्री नरेन्द्र बंगाले) रथ पर सवार हो सके, इस वादे के साथ कि चलते-चलते साक्षात्कार करके पिथौरा में रथ से उतरना होगा. रथ पर चढ़ते ही आदरणीया सुषमाजी को अभिवादन कर हम एक ओर खड़े हो गए. बागबाहरा की सभा के बाद रथ रवाना हुआ तो फिर लगभग 20 किमी के बाद एक छोटी-सी स्वागत सभा तेंदूकोना में होनी थी और इसी दौरान रथ के भीतर परम आदरणीय आडवाणी जी का साक्षात्कार लिया.

यह पूरा होत-होते तेंदूकोना आया, और वहां स्वागत के बाद रथ पिथौरा चला. साक्षात्कार के दौरान आदरणीया सुषमा जी रथ के कक्ष से बाहर मंचनुमा प्लेटफार्म पर अपने अन्य सहयोगियों के साथ बैठी रहीं. वे तब भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में जानी जाती थीं, हालांकि तब तक वे केन्द्र में श्रद्धेय अटलजी की 13 दिनों की सरकार में मंत्री भी रह चुकी थीं और विश्वासमत पर अपने मुखर-प्रखर वक्तृत्व की ओजस्विता से उन्होंने समूचे भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर अमिट प्रभाव छोड़ा था. पिथौरा प्रवेश के साथ ही सभा को श्री आडवाणी व सुषमाजी ने संबोधित किया. फिर वहीं शासकीय विश्राम गृह में भोजनादि के लिए रुकना तय था. वहां पहुंचने के बाद रथ से उतरकर हम आदरणीया सुषमाजी के साथ उसी कक्ष में चले गए, जो उनके विश्राम के लिए आरक्षित था. वही सौम्यता, वही मुस्कान… हमारे अभिवादन का आत्मीय प्रत्युत्तर देकर हमसे परिचय किया.

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मैंने कहा… हम सबने अब तक टीवी स्क्रीन पर ही भाषण देते और दिल्ली के पत्रकारों के जवाब देते आपको देखा-सुना है… आज आपको प्रत्यक्ष देखकर-सुनकर मन आनंदित हो रहा है. उन्होंने उतनी ही उदारता के साथ कहा- यह सब आप लोगों का स्नेह ही है. उन्होंने बैठने का संकेत किया और छत्तीसगढ़ के बारे में कुछ बातें कीं. फिर नियत समय पर काफिला बसना-सराईपाली होते हुए ओड़िशा के लिए प्रस्थान कर गया. आदरणीया… श्रध्देया… सुषमा जी! आपकी पुण्य स्मृतियों को कोटिशः प्रणाम!! भगवान महाकाल आपकी पावन आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें और समूचे देशवासियों को आपकी तरह ही शुचितापूर्ण, सुसंस्कारित और अनुशासित सार्वजनिक जीवन जीकर राष्ट्र के निर्माण में नित-नए प्रतिमान गढ़ने की सामर्थ्य प्रदान करें… यही विनम्र प्रार्थना. ॐ शांतिः! शांतिः!! शांतिः!!!

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