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बिजली कटौती : सरकारी छल-प्रपंच की शर्मनाक सच्चाई अंतत: सामने आ गई!

Published on: January 30, 2020
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अनिल पुरोहित

छत्तीसगढ़ के बिजली उपभोक्ताओं के साथ सालभर से हो रहे छलावे का जो खुलासा एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए किया गया है, उससे प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े हुए हैं. न केवल छत्तीसगढ़, अपितु मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी कांग्रेस के सत्ता में आते ही बिजली कटौती का जो दौर शुरू हुआ, उससे इस सन्देह का बीजारोपण तो हो ही चुका था कि कहीं यह बिजली कटौती किसी सोची-समझी चाल का परिणाम तो नहीं है? विशेषकर छत्तीसगढ़ में बिजली कटौती इसलिये संदेह के दायरे में थी क्योंकि पूर्ववर्ती प्रदेश भाजपा सरकार के कार्यकाल में सरप्लस बिजली और जीरो पॉवर-कट ने छत्तीसगढ़ को एक अलग पहचान दी थी और एकाएक कांग्रेस सरकार के आते ही पूरा प्रदेश लालटेन युग की ओर बढ़ गया.

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सरप्लस बिजली वाले छत्तीसगढ़ में जब बिजली कटौती को लेकर हल्ला मचा और त्राहिमाम के हालात पैदा हुए तब प्रदेश सरकार ने बजाय बिजली कटौती के कारणों को जाँचने के, यह हास्यास्पद बयानबाजी की थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा विचारधारा के अफसर बिजली कटौती करके प्रदेश सरकार को बदनाम करने में लगे हुए हैं. प्रदेश की कांग्रेस सरकार की राजनीतिक सोच के दिवालिएपन की इससे बड़ी और कोई हास्यास्पद मिसाल शायद ही मिलती कि वह बिजली कटौती के लिये भी रास्वसं को आरोपित कर रही थी. यह प्रदेश सरकार की विफलता थी कि बिजली बिल हाफ का वादा करके सरकार में आई और प्रदेश में बिजली कटौती का दौर शुरू हो गया. बिजली बिल हाफ का वादा जब ‘बिजली ही हाफ’ के जुमले में बदलते ही प्रदेश सरकार की किरकिरी होनी शुरू हुई, तब उन्हीं दिनों छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव जिले के मुसरा (डोंगरगढ़) निवासी मांगीलाल अग्रवाल का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक इन्वर्टर कंपनी के अधिकारी की बातचीत का हवाला था कि इन तीनों राज्यों में प्रदेश सरकारों की शह पर बिजली कटौती इसलिए हो रही है क्योंकि इन्वर्टर कंपनियों को व्यावसायिक लाभ पहुँचे और चुनावी चंदों की भरपाई हो सके.

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इस वीडियो के वायरल होने के कुछ ही दिनों बाद महासमुंद जिले के 50 गाँवों में सात दिन तक चले ब्लैक आउट की एक खबर न्यूज पोर्टल वेब मोर्चा पर जारी हुई. इन दोनों ही प्रकरणों ने इस संदेह को बल प्रदान किया कि बिजली कटौती के लिए प्रदेश सरकार ने कैसा छल-प्रपंच बुना है और तब शर्मनाक सच्चाई के सामने आने से भयभीत प्रदेश का सत्ता प्रतिष्ठान तिलमिलाकर एक नए तरह का आतंकराज कायम करने पर आमादा नजर आया था. मांगीलाल अग्रवाल और न्यूजपोर्टल के दिलीप शर्मा को राजद्रोह और राज्य सरकार के खिलाफ उकसाने के आरोप में सीधे गिरफ्तार कर लिया गया था. लेकिन, स्टिंग ऑपरेशन के जरिये हुए खुलासे ने अब जाकर यह साफ कर दिया है कि इन्वर्टर कंपनियों और बिजली कंपनी के अफसरों की मिलीभगत से प्रदेशभर में बिजली कटौती का यह दौर चला जिसे प्रदेश सरकार के संरक्षण की आशंका को बल मिला है.

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इस स्टिंग ऑपरेशन के बाद भी कांग्रेस नेताओं ने इस सच्चाई को स्वीकारने के बजाय एक बार फिर अपनी नाकामी और साजिशों को सियासी बयानबाजी से नकारकर जिस तरह इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने की कोशिश की है, उससे पूरा प्रदेश विस्मित है. पर उससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि इन्वर्टर कंपनी और बिजली अधिकारियों की मिलीभगत से रचे गये बिजली कटौती के इस प्रपंच से प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनकी सरकार पर जो आँच आई है, उससे वह कैसे बचेगी. क्या मांगीलाल अग्रवाल के वायरल वीडियो की सच्चाई अब लोगों के गले नहीं उतरेगी. एक वीडियो वायरल होने और एक खबर जारी होने को प्रदेश सरकार राजद्रोह बताकर जिस तरह के प्रशासनिक आतंकवाद की जमीन तैयार रही थी, क्या वह मानसिकता इस सरकार के असहमति के प्रति असहिष्णु होने का परिचय नहीं देती. अब जबकि स्टिंग ऑपरेशन ने सारा सच बेनकाब कर दिया है, तब सरकार क्या फिर विपक्ष पर आरोप लगाकर अपना पल्ला झाड़ती हुई शोभा दे रही है?

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और फिर राजद्रोह व सरकार के खिलाफ उकसाने वाले उन आरोपों का क्या आधार रह जाता है, जिसमें मांगीलाल अग्रवाल और दिलीप शर्मा को गिरफ्तार कर मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना दी गई. उन दोनों की सामाजिक प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को उनकी गिरफ्तारी से जो ठेस पहुँची, उसकी भरपाई यह सरकार कैसे करेगी. प्रदेश सरकार के सामने यह प्रश्न हमेशा खड़ा रहेगा कि राजनीतिक असहिष्णुता और अपने नौकरशाहों के आतंकराज के चलते वे छत्तीसगढ़ को कैसा राज्य बना रहे हैं? बिजली का अंधेरा तो छंट जाना है लेकिन सच को स्वीकारने के बजाय जिस असहिष्णुता के धरातल पर छत्तीसगढ़ को यह सरकार गढ़ने जा रही है, उस धरातल पर फैलाए जा रहे राजनीतिक मिथ्या प्रलाप और छल-प्रपंच के अंधकार से यह छत्तीसगढ़ कब और कैसे मुक्त होगा?

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