खरसिया. किसानों के हितों को लेकर भूपेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना रोका-छेका 1 जुलाई से लागू कर दी गई है. वहीं योजना के क्रियान्वयन के लिए जो जिम्मेदार हैं, वे ही इस योजना को धता बताते हुए अप्रत्यक्ष रूप से गौ तस्करी को बढ़ावा देते नजर आ रहे हैं. राष्ट्रीय गौ रक्षा वाहिनी गौ सेवा संघ के जिलाध्यक्ष राकेश केशरवानी को सूचना मिली कि ग्राम पंचायत औरदा के सरपंच एवं अन्य ग्रामीणों की सहमति से 85 गोवंश पालन हेतु धर्मजयगढ़ के निवासियों को प्रदान किए गए हैं. ऐसे में संदिग्ध परिस्थितियों को भांपते हुए राकेश केसरवानी सहित गौ रक्षा वाहिनी के खरसिया नगर अध्यक्ष रानू दर्शन ने पलगड़ा क्षेत्र में खोजबीन की.
वहीं रास्ते में ग्राम कोठीकुंडा के पास गोवंश का एक दल मिल भी गया. ताज्जुब की बात है कि यह दल खरसिया जनपद के ग्राम औरदा से निकलने वाला नहीं, वरन् जांजगीर-चांपा जिले के सक्ती जनपद के ग्राम चमराबरपाली से निकला था. ऐसे में तत्काल जोबी चौकी प्रभारी को सूचना दी गई. वहीं चौकी प्रभारी थानेश्वर नायक पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे. जिन्होंने 42 गोवंश जो जांजगीर-चांपा जिले से आ रहे थे, उन्हें ग्राम खम्हार के गौठान में सुरक्षित पहुंचाया. वहीं पुलिस द्वारा आगे की कार्रवाई की जा रही है.
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एसपी मीणा ने लिया क्विक एक्शन
क्षेत्र में बढ़ रही गौ तस्करी को लेकर विष्णुचंद्र शर्मा ने जब रायगढ़ एसपी अभिषेक मीणा से बात की तो उन्होंने मामले की गंभीरता को समझते हुए जोबी चौकी को तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए. वहीं यह सुनिश्चित करवाया कि जो लोग गोवंश को पालने के नाम पर ले जा रहे हैं, उनके घरों में पहुंच कर पुलिस तफ्तीश करेगी कि वस्तुतः यह लोग गोपालक हैं अथवा गौ तस्कर. एसपी अभिषेक मीणा के क्विक एक्शन को लेकर क्षेत्रवासियों में पुलिस के प्रति विश्वास और प्रगाढ़ हो गया है.
तो औरदा के 85 गोवंश कहां हैं?
बताया जा रहा है कि पलगड़ा क्षेत्र से प्रतिदिन गोवंश के चार से पांच झुंड निकलते हैं. जिनमें सैकड़ों गोवंश धर्मजयगढ़ के चरखापारा मवेशी बाजार पहुंचते हैं. वहीं जानकारों की मानें तो इन्हें कंटेनर में लोड कर कत्लखाने भेजा जाता है. यह भी कहा जाता है कि इन सब अवैधानिक गतिविधियों को राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है. वहीं जगह-जगह चौकियों से छुप-छुपाकर गौ तस्कर वेस्ट बंगाल तक गोवंश की सप्लाई करते हैं. वहीं अब तक यह भी पता नहीं चल सका कि ग्रामपंचायत औरदा से निकलने वाला गोवंश का दल कहां निकल गया.
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रोका-छेका के लिए क्यों गंभीर नहीं अधिकारी
प्रायः यह देखा जाता है कि जिन पालतू गायों का दूध पीकर या फिर बेचकर लोग अपना जीवनयापन अथवा व्यवसाय करते हैं, वृद्ध होने पर उन्हें ही आवारा भटकने पर छोड़ देते हैं. जिसका भरपूर फायदा गौ तस्कर उठाते हैं. ऐसे में गांव-गांव में बन रहे गौठान एवं रोका-छेका योजना पर यक्ष प्रश्न खड़ा होता है. वहीं जब गौ रक्षक दलों द्वारा गौ तस्करी की संदिग्ध परिस्थितियों को भांपते हुए जवाबदार अधिकारियों को सूचना दी जाती है, तो उनका जवाब भी निराशाजनक मिलता है.
सरपंच को किसने दिया अधिकार?
छत्तीसगढ़ के प्रख्यात गौ रक्षक ओमेश विशेन से गौ तस्करी के गंभीर मुद्दे को लेकर बात की गई तो उन्होंने कहा कि सरपंच अथवा पंचायत सचिव किसी भी अधिकार के तहत गोवंश को दान हेतु अथवा पालन हेतु नहीं दे सकते. जबकि देखा जा रहा है कि गांव-गांव में सरपंच की सहमति का पत्र लेकर गौ तस्कर अपना काम आसानी से पूरा कर रहे हैं. वहीं यह भी कहना होगा कि जब शासन ने गांव के सरपंच तथा पंचायत सचिव को रोका-छेका योजना के लिए निर्देश दिए हैं, तो वे किन अधिकारों के तहत गोवंश को अनजान लोगों के हाथों सौपंते हैं?
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