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छत्तीसगढ़ का सामान्य प्रशासन विभाग बोले तो ‘सफेद हाथी’!

Published on: November 4, 2022
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राज्य सरकार के अधीन अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट कार्यों का संपादन करने वाला एक विभाग है, जो सामान्य प्रशासन विभाग के नाम से जाना जाता है. यह विभाग शासकीय नियमों के लिए पोषक या नोडल विभाग माना जाता है. अखिल भारतीय प्रशासनिक और राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के लिए यही विभाग अनुशासनिक प्राधिकारी भी है, लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य के अस्तित्व में आने के बाद यह विभाग केवल उच्चाधिकारियों का स्थानांतरण करने वाला विभाग बनकर रह गया है! अनेक मामलों में यह विभाग अक्षम, नाकारा और प्रदेश के लिए भारस्वरूप साबित हो रहा है. छत्तीसगढ़ के सामान्य प्रशासन विभाग जैसा ‘सफेद हाथी’ सम्पूर्ण विश्व में दुर्लभ है.

इस विभाग के नाकारापन का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जब इस विभाग से अन्य विभागों द्वारा सेवा संबंधी मामलों में किसी तरह का मार्गदर्शन मांगा जाता है, तब इस विभाग के द्वारा लिखित रूप में मार्गदर्शन नहीं देते हुए किसी ऐसे पुराने परिपत्र या निर्देश को प्रेषित कर दिया जाता है, जिसका मूल विषयवस्तु से दूर-दूर तक किसी तरह का संबंध ही नहीं होता! छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से आज भी मध्यप्रदेश के समय के सेवा नियम प्रभावशील हैं. जबकि, नवीन राज्य के निर्माण को 22 वर्ष हो चुके हैं. इस विभाग में नया नियम बनाने लायक क्षमता ही नहीं है. कुल मिलाकर, यह एक निष्क्रिय और यथास्थिति पालक विभाग है. ऊपर वर्णित विशेषताओं के अतिरिक्त यह विभाग अत्यंत दब्बू और डरपोक भी प्रतीत होने लगा है.

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इसकी एक मिसाल यह दी जा सकती है- अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन तथा अपील) नियम, 1969 के प्रावधानों के अनुसार उक्त सेवा के सदस्यों के विरुद्ध भ्रष्टाचार/नैतिक पतन के मामलों में न्यायालय में अभियोग पत्र दाखिल होने पर उन्हें अनिवार्यतः सेवा से निलंबित किया जाना है, लेकिन डॉ. आलोक शुक्ला और अनिल टूटेजा के विरुद्ध बहुचर्चित हजारों करोड़ के नागरिक आपूर्ति निगम घोटाला में अभियोग पत्र दाखिल होने के बाद भी उन्हें निलंबित नहीं किया गया, बल्कि डॉ. आलोक शुक्ला को तीन वर्षों के लिए संविदा नियुक्ति दे दी गई! जबकि, संविदा नियुक्ति अधिकतम एक वर्ष के लिए ही दी जाती है. एक दागी अधिकारी को संविदा नियुक्ति देकर भी शासकीय नियमों की धज्जियां उड़ाई गई है.

इतना ही नहीं, इसी विभाग में संविदा में कार्यरत एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डीडी सिंह द्वारा डॉ. आलोक शुक्ला की पत्नी रेखा शुक्ला का छत्तीसगढ़ खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड में प्रबंध संचालक के पद पर प्रतिनियुक्ति आदेश जारी किया गया है. उक्त पद एक संवर्गीय पद है, अर्थात् उस पद पर किसी आईएएस संवर्ग के अधिकारी की नियुक्ति हो सकती है. जबकि, रेखा शुक्ला दिल्ली की एक कंपनी में काम करती थी. जांच में दोषी पाए गए एक आईएएस संवर्ग के अधिकारी सुधाकर खलखो के विरुद्ध कार्रवाई करने में यह विभाग नाकारा साबित हुआ है. आंखों की ज्योति काफी कमजोर होने के कारण हिमशिखर की चिटिंगबाजी इस विभाग को दिखलाई नहीं पड़ रही है.

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स्वागत विहार कॉलोनी में अपने परिवार के नाम से अनेक प्लाट आवंटित कराने वाले उमेश अग्रवाल के विरुद्ध कलम चलाने में इस विभाग के अधिकारियों के हाथ कांप रहे हैं. 14 दिनों तक ईडी की हिरासत में रहने के बाद न्यायिक हिरासत में सेन्ट्रल जेल भेजे जाने के कई दिनों बाद समीर बिश्नोई को निलंबित किया गया है. इस विभाग के नाकारापन को उजागर करने में कागजों की होने वाली बर्बादी को ध्यान में रखते हुए सीमित उदाहरण ही प्रस्तुत किए गए हैं. इसलिए जनहित में अब यह जरूरी हो गया है कि इस विभाग को समाप्त कर इसके कार्यों को विधि एवं वित्त विभाग को सौंप दिया जाए.

प्रदेश का कुल कर्ज एक लाख करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है, अतः इस विभाग को समाप्त कर ‘सफेद हाथी’ को पालने में होने वाले व्यय से बचा जाना चाहिए. हमारे द्वारा जनहित में यह बहुमूल्य सलाह भी निःशुल्क दी जा रही है कि सेवा नियमों संबंधी परामर्श व मार्गदर्शन के लिए एक सामान्य प्रशासन बोर्ड का गठन कर उसका मुख्यालय टिकरापारा अथवा टूरी हटरी, रायपुर में स्थापित किया जाए और रेखा शुक्ला को इस बोर्ड के प्रबंध संचालक पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपते हुए ‘सर्वगुण सम्पन्न’ किसी नेता को बोर्ड का अध्यक्ष बनाया जाए.

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