विष्णुचंद्र शर्मा
आज सोशल मीडिया पर प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है. वहीं जनप्रतिनिधियों और राजनेताओं की बधाइयों का तांता भी लगा हुआ है, परंतु हम कैसे मान लें कि प्रेस स्वतंत्र है? फिजाओं में तो कुछ अलग ही माहौल देखा जा रहा है. सच कहने अथवा लिखने की उम्मीद रखने वाले बड़ी-बड़ी बातें सिर्फ कहते भर हैं, दरअसल तो सच कोई हजम कर ही नहीं पा रहा. देखा जा रहा है कि सच बोलने वाला हमेशा प्रताड़ित होता आया है. अगर ऐसा ही रहा तो लिखने वाले सच लिखने से कतराने लगेंगे. यूं तो मीडिया को चौथा स्तंभ भी कहा जाता है. वहीं कुर्सीदानों के इशारों पर अक्सर इस चौथे स्तंभ पर ही कुठाराघात किया जाता है. जबकि तीन टांगों वाली कुर्सी कबाड़ होती है!
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कितने मामलात गिनाएं, यह फेहरिस्त तो बहुत लंबी हो जाएगी. हाल ही के मामले को देखिए जिस पर प्रशासन ने कार्रवाई कर खुद से सच साबित किया है. अब ऐसा क्या हुआ कि लैलूंगा के मुखर पत्रकार आशुतोष मिश्रा को प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है? मैं बात को दोहराना चाहता हूं कि कार्रवाई करने और कार्रवाई होने के बीच ऐसा क्या हुआ जिसने पत्रकार पर अनुचित कार्रवाई करने की स्थिति पैदा कर दी! दरअसल तो अब आईना देख कर शक्ल सुधारने के बजाय आईने पर पत्थर मारने का वही पुराना ढर्रा अपनाया जा रहा है. यह क्यों नहीं सोचा जाता कि चेहरा ही खराब हो तो आईने का क्या दोष?
खैर !
महज़ अल्फाज़ नहीं ये बातें रूहानी हैं!
रोके नहीं रुकते ये जज्बे खानदानी हैं!!
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