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भूपेश जी! अब तो प्रहरियों पर भी उठ चुके हाथ!

Published on: October 2, 2020
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विष्णुचंद्र शर्मा
जिनकी लौ बने स्याह रातों की हमसफ़र
वो चराग़ रहें सलामत रब खैर करे!

जिसे आप पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने वाला पहला प्रदेश बनाना चाहते थे, वहां आपके सलाहकार के खासम खास ने पत्रकार पर ना सिर्फ हाथ उठाया वरन् संघातिक हमला और भद्दी गालियों की बौछार से प्रदेश की साख में दाग भी लगा दिया. बंदिशों से परे चौथे स्तंभ के चीरहरण का कुत्सित प्रयास भी किया गया. वह भी थाने के भीतर! बीते 2 वर्षों में ऐसा क्या हो गया कि आपकी सोच की दिशा ही भटक गई? जिन्हें आप महफूज रखना चाहते थे, सरेआम उनकी बेइज्जती हो रही है और ऐसा इन दिनों चलन सा बढ़ता जा रहा है. पर आप इस गंभीर मुद्दे को भी वही अंग्रेजों वाली जांच की चादर से ढंकना चाहते हैं? ताज्जुब है कि एक-दो नहीं वरन् तीन कलमकार आपको दिशा दिखा रहे हैं, पर क्या इन्होंने भी अपनी बिरादरी के अपमान की घूंट पीकर ठकुरसुहाती तान छेड़ दी?

http://सत्तावादी दोहरे राजनीतिक चरित्र का वीभत्स प्रदर्शन है पत्रकारों पर हमले की वारदात



परित्राणाय साधुनाम लिखी उस चारदीवारी में रक्षकों के हाथ और मुंह क्यों कर सिले रह गए जहां बेखौफ बेधड़क यह सब होता रहा? माफिया से सिंडिकेट बने दबंगों के सामने खामोश रहने की यह मजबूरी, चंद टुकड़ों का लालच था या खौफ की राजनीति ने उन्हें भी पंगु बना दिया? बुद्धिमानी तो कहती है कि राख को भी सावधानी से कुरेदा जाए, वहीं दहकते अंगारों से दिल्लगी की जाए तो हाथों को जलने से कैसे बचाया जा सकता है? आदिवासी हितों एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध 15 वर्ष के विशाल वृक्ष को उखाड़ने की कूवत रखने वाला पौधे से क्यूंकर खौफ खाएगा! अनियंत्रित हो रहे प्रशासन और दिशा विहीन हो रही शासन प्रणाली को अब भी संभाल लीजिए, वक्त ठहरता कहां है साहब! यह तो गुजर ही जाएगा!

http://कांकेर ने जो घंटी बजाई है, क्या भूपेश बघेल ने सुना उसे ?

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