रजिंदर खनूजा
पिथौरा. लॉकडाउन के चलते अन्य प्रांतों में रोजगार करने वाले मजदूरों का रोजगार छीन जाने से ये मजदूर पैदल या साइकिल से ही सैकड़ों किमी की यात्रा कर भूखे-प्यासे ही निकल पड़े हैं. ऐसे ही मजदूरों के जत्थे को स्थानीय कुछ सामाजिक संगठन राहत पहुंचाते हुए उन्हें भोजन करवाने के अलावा सूखा राशन एवं पानी देकर उन्हें गंतव्य की ओर भेज रहे हैं. गुरुवार रात चंद्रपुर महाराष्ट्र एवं उरला रायपुर में काम करने वाले करीब 26 मजदूर फोरलेन के करीब एक बरगद पेड़ के नीचे सोए थे. शुक्रवार सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकले सामाजिक संगठन के कार्यकर्ता देवेंद्र बघेल एवं राजिम तांडी ने इनकी दर्जनों साइकिल और इन्हें बरगद पेड़ के नीचे देखकर इनसे पूछताछ की. इस पर साइकिल सवारों ने बताया कि वे महाराष्ट्र के जो चंद्रपुर जिले के एसीसी सीमेंट के एक प्लांट में काम करने वाले झारखंड के निवासी हैं जो कि 14 की संख्या में हैं.
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वे 2 मई को चंद्रपुर से रांची झारखण्ड जाने के लिए निकले थे. जो रात में साइकिल खराब होने के कारण पिथौरा शहर के बाहर ही रुके थे. इनकी हालत खराब थी. उनके साथ रायपुर उरला औद्योगिक क्षेत्र के एक वायर कंपनी के 12 लोग भी साइकिल से पिथौरा में रुके थे. वह लोग भी 5 मई को रायपुर से निकले थे इनकी भी साइकिल खराब थी. उनके पास पैसे भी नहीं थे कि वह अपनी साइकिल बनवा सकें. सुबह 4 बजे सामाजिक संगठन के उक्त कार्यकर्ताओं ने साइकिल बनाने वाले पिथौरा के एक मिस्त्री से निवेदन कर उनकी साइकिल रिपेयर करवा कर सभी 26 लोगों को खाना खिलाकर उनके रास्ते के लिए सूखा अनाज भी व्यवस्था कर दिए. इन साइकिल सवारों को संगठन के सदस्यों ने हिदायत भी दी कि जब गांव पहुंचेंगे तो क्वॉरंटाइन पर 14 दिन तक घर से बाहर रहना है. अपना स्वास्थ्य परीक्षण अवश्य कराना है तभी परिवार से मिलना है.
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मालिक नहीं दे रहे साथ
कोई भी मजदूर किसी भी कंपनी या फैक्ट्री में नियमित कार्य करते हुए यह सोचता है कि जब कोई संकट आए तब उनके मालिक ही उनकी रक्षा एवं सहयोग करेंगे. कुछ ऐसी ही अनेक सुविधाओं के लिए शासन के श्रम विभाग से कानून भी बनाया गया है. इसके अलावा केंद्र से लेकर प्रदेश सरकारों ने भी कोरोना महामारी के इस संकट भरे समय में सभी कंपनियों, फैक्टरियों सहित अन्य व्यवसायियों से निवेदन किया था कि कोई भी अपने मजदूरों एवं कर्मचारियों को ना निकाले और ना ही उनका वेतन रोकें. बावजूद सरकारों की कोई सुनने वाला नहीं है. बहरहाल, प्रवासी मजदूरों के घर लौटने के पूर्व किया गया लॉकडाउन अब खासकर मजदूर एवं अपने शहर से बाहर रहकर नौकरी करने वालों पर कोरोना से बड़ा संकट सामने आ चुका है.
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अनुमति की जटिल प्रक्रिया
साइकिल से यात्रा कर रहे मजदूरों ने बताया कि प्रवासी मजदूरों सहित अन्य बाहर गए लोगों को घर वापसी के लिए शासन के प्रावधानों की कठिन प्रक्रिया से गुजरना होता है. लिहाजा इन प्रक्रियाओं से बचने के लिए मजदूरों ने पैदल ही हजारों किलामीटर का सफर तय करने का मन बनाया. पर पैदल राह में भी अनेक प्रदेश की सीमाओं पर चौकसी एवं कड़ी जांच पड़ताल के चलते मजदूर परेशान थे. इसके बाद मजदूरों ने बगैर जांच पड़ताल ही अपने घरों तक पहुंचने के लिए रेलवे ट्रैक पर चलने का मन बनाया. अब मजदूर रेलवे ट्रैक से ही प्रवास स्थान से अपने गांव की ओर पैदल ही बढ़ गए हैं. ऐसी स्थिति में इन बेसहारा मजदूरों को हमेशा जान का जोखिम उठा कर ही चलना पड़ रहा है.







