विष्णुचंद्र शर्मा
खरसिया. शहर में निकाय चुनाव की सरगर्मी तेजी से बढ़ गई है. सत्तारूढ़ दल का प्रत्याशी बनने के लिए होड़ लगी हुई है. हालांकि सत्ता प्राप्ति के लिए जनहित के मुद्दों की जरूरत होती है, परंतु नगर निकाय में हुकूमत करने के लिए यहां जोड़-तोड़ एवं छींटाकशी की जा रही है. विकास के नाम पर यह शहर तो पिछले बीस पच्चीस वर्षों से छला जा रहा है. ऐसा भी नहीं की नगर में विकास कार्य ना हुए हों, परंतु सभी विकास भ्रष्टाचार की चासनी में लिपटे रहे. गुणवत्ता एवं देखरेख के अभाव में अनेकों निर्माण कार्यों में करोड़ों रुपए आहुत हो गए, परंतु फिर जस का तस. उल्लेखनीय होगा कि नगर की ऐतिहासिक धरोहर बंधवा तालाब पर एक नहीं दो बार सौंदर्यीकरण किया गया, परंतु अब उसे गटर बना दिया गया है. वहीं राजमाता सिंधिया के नाम से बना उद्यान कंटीली झाड़ियों से लथपथ उजाड़ बन चुका है.
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तो व्यवसायिक सोच को क्रियान्वित करते हुए नगर पालिका के कर्मचारियों हेतु बने निवास और लहलहाती हरियाली वाले उद्यान की बलि देकर विशालकाय अंबेडकर कांप्लेक्स भी बना दिया गया. परंतु टेक्निकल कारणों से नीलामी में मिली दुकानें अब तक हकदारों को हैंडओवर नहीं हो पा रहीं. वहीं इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि नगर में मूलभूत जरूरत प्रकाश पानी के साथ सफाई की तंदुरुस्त व्यवस्था की गई है. विवेकानंद स्पोर्ट कांप्लेक्स भी बनाया गया, तो लखीराम ऑडिटोरियम भी. लगभग सभी गली मोहल्लों में सड़क का निर्माण भी किया गया. परंतु सड़क निर्माण की गुणवत्ता को चैलेंज करते हुए जब खेमामल लोकायुक्त तक पहुंचे तो दो ही दिनों में नवनिर्मित सीसी रोड पर डामरीकरण कर राशि का आहरण भी कर लिया गया. पिछले 20 वर्षों में नगर में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों ने शासन किया, परंतु जनता हर बार ठगी गई. वहीं अब फिर बदलाव के इस दौर में इन्हीं आरोप-प्रत्यारोपों के जाल में उलझकर जनता गुमराह ना हो जाए. क्योंकि जनता के पास तीसरा कोई विकल्प भी नहीं है. ऐसे में कहना होगा कि
नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है.
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