विष्णुचंद्र शर्मा
खरसिया. निकाय चुनाव के मद्देनजर सत्तारूढ़ पार्टी की तैयारियां 6 महीने पूर्व से ही प्रारंभ हो चुकी हैं. कुछ तो ऐसा होना स्वाभाविक भी है, वहीं खरसिया नगर पालिका मंत्री उमेश पटेल का गृहनगर भी है. ऐसे में यह सबसे छोटा चुनाव भी नाक की बात पर आ गई है. वहीं भाजपाई खेमे में निराशा देखी जा रही है. इसके पीछे नगर पालिका में पूर्ण बहुमत एवं अध्यक्षता के बावजूद साल भर से विकास कार्यों में आ रहे व्यवधानों का हवाला भी दिया जा रहा है. हालांकि विधानसभा चुनाव में मिली शर्मनाक हार का बदला लेने के लिए भाजपा के पास एक अवसर जरूर आ गया है, परंतु अपने-अपने गुटों में बंटी पार्टी कितनी सफल हो पाएगी, कहा नहीं जा सकता. दरअसल, दोनों ही पार्टियों के अंदरूनी हालात खस्ताहाल नजर आ रही हैं.
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कांग्रेस में भले ही नंदेली घराने का हवाला दिया जा रहा हो, परंतु गुटबाजी से यह भी अछूते नहीं हैं. सत्ता के दमखम में शामिल होने के लिए 18 वार्ड के लिए भी सैकड़ों प्रत्याशी अपनी ओर से पुरजोर प्रयास कर रहे हैं. टिकट से वंचित उम्मीदवारों की बेरुखी को जीत के रास्ते में बाधा बनने से नहीं रोका जा सकता. कहना होगा कि नगर के विकास एवं आमजनों की जरूरतों पर किसी भी पार्टी का ध्यान केंद्रित नहीं हो पा रहा. वहीं आरोप-प्रत्यारोप के दौर अब नगर की फिजाओं में राजनीतिक रंग भरने लगे हैं. दूसरी ओर पूर्ण विश्वास से भरी कांग्रेस पार्टी का दावा है कि बहुमत से अधिक पार्षदों के साथ नगर निकाय पर उनका साम्राज्य होगा. इस दावे के पीछे वार्ड परिसीमन का गणित है, जो भाजपा के पितृपुरुष के गृहनगर का चुनावी समीकरण बिगाड़ सकती है.
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