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पेंशन घोटाला : समिति ने की जांच, 41 को नियम विरुद्ध पेंशन

Published on: August 20, 2021
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पिथौरा. 41 युवाओं को विगत 9 साल से वृद्धा पेंशन मिलने की खबर ‘छत्तीसगढ़ जनादेश‘ में प्रकाशन के बाद गुरुवार को जिला पंचायत द्वारा गठित चार सदस्यीय जांच समिति ने ग्राम बरेकेल खुर्द पहुंच कर जांच की. अब समिति द्वारा जिला पंचायत में जांच रिपोर्ट पेश की जाएगी जहाँ से कार्रवाई की जानी है. गुरुवार को कुछ स्थानीय पत्रकारों की उपस्थिति में समिति द्वारा जांच की गई. जांच में पाया गया कि जिन 41 लोगों को नियम विरुद्ध पेंशन दिया जा रहा है वे वास्तव में पेंशन के हकदार नहीं हैं.

इन सभी के आधार कार्ड तो पेंशन के लिए पात्र होने की जन्मतिथि अंकित है. परन्तु वास्तविक मतदाता सूची एवं जन्मतिथि में आधार से करीब 10-20 वर्ष तक उम्र कम दर्ज की गई है. 41 में करीब 16 पेंशनधारियों ने अपने बयान समिति के समक्ष दर्ज कराए हैं. किसी ने भी अपनी उम्र के बारे में स्पष्ट नहीं बताया. लिहाजा अब आधार कार्ड की जांच भी की जा सकती है.

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पंचायत में कोई प्रस्ताव नहीं : सिंह

समाज कल्याण विभाग की उप संचालक श्रीमती संगीता सिंह ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए बताया कि वे जांच के लिए टीम के साथ आईं हैं. कुछ ग्रामीणों सहित पंच, सरपंच एवं सचिव के बयान लिए गए हैं. प्रथम दृष्टया किसी भी पेंशन प्रकरण में पंचायत का प्रस्ताव अनिवार्य होता है पर इनमें से किसी के नाम का प्रस्ताव नहीं है और ना ही इसकी जानकारी जिला स्तर पर दी गई है. सभी पेंशनधारी विगत 7-8 वर्षों से पेंशन लेने की बात स्वीकार कर रहे हैं. क्या अब इनका पेंशन बंद होकर अब तक दिए गए पेंशन की रिकवरी की जाएगी? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि हमारे द्वारा रिपोर्ट पेश की जाएगी उसके बाद पुनः सत्यापन के पश्चात ही कोई कार्रवाई की जाएगी.

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आखिर जिम्मेदार कौन

प्रथम दृष्टया यह बात सामने आ रही है कि पंचायत सचिव एवं सरपंच ने उक्त अपात्रों का नाम पेंशन हेतु आखिर किसी के दबाव में भेजा या स्वयं ही भेज दिया. नाम भेजने के बाद पिथौरा जनपद के तत्कालिक जिम्मेदार अधिकारियों ने इसकी जानकारी अपने जिला कार्यालय में क्यों नहीं दी? सचिव गुलाब कोसरिया के अनुसार जब उन्हें पता चला कि पेंशन सूची में अपात्रों का नाम है तब उन्होंने इसकी सूचना जनपद कार्यालय में दी. बाद भी पेंशन रोकने की बजाय पेंशन चालू रखने के निर्देश दिए गए. पूरे मामले को देखते हुए प्रश्न यह उठता है कि जनपद का आखिर वह अधिकारी कौन था जिसने उसे पुनः मौखिक आदेश कर पेंशन देते रहने बाध्य किया?

वर्ष 2012 एवं 2016 में सरपंच पुरषोत्तम ध्रुव द्वारा उक्त संबंध में की गई शिकायत के बाद जनपद के दो कर्मी क्रमशः श्री चौधरी एवं श्री गजेंद्र को जांच अधिकारी बनाया गया था. इन्होंने जांच की या नहीं? यदि की तो इनकी रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई की गई? यदि नहीं तो ऐसा कौन सा कारण था कि जांच रोकनी पड़ी. बहरहाल, पेंशन घोटाले का यह तो अकेला मामला है जो स्वयं सरपंच द्वारा शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं हो सकी. जानकर बताते हैं कि इस तरह के घोटाले जनपद क्षेत्र की अनेक पंचायतों में हो रहे हैं.

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