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पर्यावरण के लिए जल, जंगल पर विशेष ध्यान देने की जरूरत

Published on: June 5, 2021
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मनोज कुमार बंशीलाल डागा, खरियाररोड

1974 से विश्व पर्यावरण दिवस मनाना शुरू किया गया था. पर्यावरण के प्रति जागरूक करने के लिए, यह दिवस मनाया जा रहा है, किंतु पूरे विश्व में सर्वाधिक रूप से इन 47 सालों में कितने उपयोगी और महत्वपूर्ण जंगलों को काटकर ठूंठ बना दिया गया. जलस्त्रोत कहां से कहां पहुंच गया. जनसंख्या वृद्धि इतनी बढ़ गई है कि सभी के पेट भरने के लिए खेतों में अधिक फसल के लिए ज्यादा से ज्यादा रसायनिक खाद डाला जा रहा है. कीटनाशक दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है. जनसंख्या पर कोई भी रोक नहीं लगा पा रहा है, कारखानों से निकलता हुआ जहर सीधे नदियों में बहाया जा रहा है, वहां से समुद्र में. धरती पर गर्मी 1.10 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुकी है.

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अगर ऐसे ही जंगल कटते रहे, नदियां मरती रहीं, जनसंख्या बढ़ता रहे और उसके ऊपर 5 जी, चलता रहा तो कुछ समय में 1.50 तक गर्मी बढ़ने के आसार हैं. तब तूफान, बाढ़, सूखा, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि की संख्या बढ़ जाएगी. अभी इस वर्ष ही 40 के लगभग तूफान आने की संभावना बताई जा रही है, आप और हम समझ सकते हैं आने वाला वक्त कैसा होगा. जीवन (जीव+वन=जीवन) के लिए स्वच्छ अन्न, जल, मिट्टी, वायु और पर्यावरण चाहिए. जंगलों को बचाने के लिए पूरे देशवासियों को ध्यान देना होगा. हम चांद और मंगल में पानी ढूंढ रहे हैं लेकिन प्राकृतिक रुप से आसमान से बरसते पानी को सहेजने की दिशा में कोई कारगर काम नहीं कर रहे हैं. हमें भविष्य के लिए बारिश के एक एक बूंद पानी को सहेजना होगा. अनावश्यक पानी की बर्बादी को रोकने सभी को सजग होना पड़ेगा. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का अति महत्वपूर्ण योजना नदी से नदी जोड़ने को अमलीजामा पहनाना होगा. अटल जी के उक्त विचार योजना को किसी के द्वारा पलट कर नहीं देखा जा रहा है यह चिंतनीय है.

हमारी देश-प्रदेश की सरकारें, सामाजिक संगठनों, समाजसेवी संगठन सभी आगे आएं और कटते, उजड़ते वन के एक-एक वृक्षों को बचाना होगा. बारिश के पानी को रोकने की दिशा मे काम करना होगा यदि वन नहीं रहेगा तो पानी भी नहीं होगा. दो महत्वपूर्ण कार्य के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है पहला पानी को कैसे सहेजें और जंगल कैसे बढ़ाएं. हम हर वर्षा ऋतु में बड़े ही उत्साह के साथ करोड़ों की मात्रा में पौधरोपण करते हैं पर रोपे गए पौधों को सहेजने की दिशा में एक प्रतिशत भी कोई पहल नहीं करते ऐसे पौधरोपण करने से किसी को कोई लाभ नहीं होता. पौधरोपण में जो खर्च होते है वह व्यर्थ में चला जाता है. पौधरोपण नीति बनाने वालों को चाहिए कि लगाए गए पौधों का संरक्षण कैसे किया जाए. पौधरोपण करने की योजना में परिवर्तन लाया जाए.

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वर्षा ऋतु में पौधरोपण करने पूरे ब्लॉक क्षेत्र का चयन न कर ब्लॉक क्षेत्र को चार जोन में बांटकर खाली सरकारी जमीन को चिन्हित कर पौधरोपण किया जाकर उसके संरक्षण पर ध्यान दिया जाए. इस प्रकार बारी-बारी से पूरे ब्लॉक क्षेत्र में वन संवर्धन, वन संरक्षण करने से दस वर्ष के भीतर चहुंओर हरा-भरा जंगल दिखाई देगा. ऐसे करने से ही पौधरोपण योजना सफल हो सकता है. उसी प्रकार वर्षा जल को सहेजने ब्लॉक को चार जोन में बांटा जाए. बारिश के बहते पानी को रोकने खाली जगहों जहां पर हम पौधरोपण कर रहे हैं वहीं वाटर टैंक तालाब के रुप में निर्माण किया जाए. ऐसे करने से जल, जंगल दोनों को बचाया जा सकता है. हम वर्तमान में चौतरफा धरती को एक साथ हरा-भरा करने की दिशा में काम कर रहे हैं यह सही नहीं है. पौधरोपण पश्चात उसे कोई मुड़कर नहीं देखते यदि चिन्हांकित कर हम काम करें तो उसे आसानी से सहेजा जा सकता है. (लेखक ‘प्रकृति बंधु’ के नाम से जाने जाते हैं)

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