रायगढ़. जगतजननी की महिमा अपरम्पार है. विकासखंड खरसिया से 7 किलोमीटर दूर बसे ग्राम बड़े डूमरपाली में विराजित माता भख्खेश्वरी सभी आपदाओं से पूरे गांव की रक्षा करती हैं. बताया जा रहा है कि 250 वर्ष पूर्व माँ की प्रतिमा नदी में बहते-बहते गांव पहुंची थी. वहीं गौंटिया के स्वप्न में आकर गांव में रहने की इच्छा प्रकट की थी. माना जाता है कि सरगुजा संभाग से उदयपुर की रियासत के राजा के यहां माँ की पूजा पूरी श्रद्धा से की जा रही थी. वहीं एक युद्ध में उदयपुर के राजा का परास्त होना राजा को अत्यधिक खला. तब राजा ने सोचा कि कुलदेवी माँ भख्खेश्वरी के रहते हुए भी मैं जीत न सका. इस मनोविकार से राजा ने देवी माँ को नदी में विसर्जित कर दिया.
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बहते-बहते माँ की प्रतिमा बड़े डूमरपाली आ गई. वहीं माता ने जुड़ावन गौटिया को स्वप्न में दर्शन देकर नदी किनारे बुलाया और कहा कि मुझे अपने गांव में स्थान दो. ऐसे में जुड़ावन गौंटिया ने साथियों के साथ नदी किनारे जाकर दर्शनों की इच्छा से माता की आराधना की. माता ने प्रसन्न होकर कहा कि मुझे आपके राज में स्थान चाहिए और आप सभी को मेरा संपूर्ण आशीर्वाद रहेगा. गांव के बुजुर्गों ने बताया कि ग्राम बड़े डूमरपाली में लगभग ढाई सौ वर्ष पहले माँ की यह प्रतिमा स्थापित की गई थी तभी से गांव में खुशहाली एवं प्रसन्नता है. माता सभी के दुखों का निवारण करती हैं. वर्तमान में बैगा मोतीचंद डनसेना माता के दरबार में सेवा करते हैं.
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बड़े डूमरपाली सहित आसपास के क्षेत्रवासी माँ भख्खेश्वरी की आराधना करते हैं और मां उनकी मुरादें पूरी करती हैं. वहीं माता की उत्पत्ति के संबंध में ग्रंथों में उल्लेख की बातें भी कहीं जाती हैं. प्रचलित दंतकथा है कि महिषासुर के दूत जिसको वरदान प्राप्त था कि वह दिन में ही मारा जाए, परंतु सूर्य उदय ना रहे. ऐसे में देवों के सामने संकट था कि इस दैत्य का संहार कैसे किया जाए, तभी निमेश्वरी देवी और माँ भख्खेश्वरी का अवतार हुआ. निमेश्वरी देवी ने सूर्य को अपने गर्भ में धारणकर दिन में भी सूर्य को लुप्त किया, तब माँ भख्खेश्वरी ने दैत्य का वध किया था.







