विष्णुचंद्र शर्मा
रायगढ़. खरसिया से महज 6 किलोमीटर दूर धर्मजयगढ़ मुख्य मार्ग में पहाड़ी पर विराजीं ढाणादेवी मैया भक्तों की झोलियां खुशियों से भर देती हैं. चार दशक पूर्व बना यह मैय्या का मंदिर इस मनोरम स्थान पर चौधरी परिवार द्वारा बनवाया गया था. हरियाणा के चरखी-दादरी से आकर बिलासपुर संभाग में जगह-जगह बसे चौधरी एवं स्याणा-पोता परिवारों के बच्चों का मुंडन संस्कार पूरी आस्था के साथ इसी मंदिर में संपन्न किया जाता है. इस मंदिर की देखरेख चंदूलाल लखीराम परिवार द्वारा की जाती है.
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कभी नहीं सूखता बंदरचुंआ
सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के अंतिम छोर पर स्थित ग्राम भालूनारा की इन मनोरम वादियों में मानो आस्था का केंद्र ही सिमट आया है. वहीं मैया रानी के चरण पखारने के लिए पहाड़ों का सीना चीरकर यहाँ अमृतधारा अविरल झरती रहती है. भीषण गर्मी के दिनों में भी यह अमृतधार नहीं रुकती. पहाड़ों से झरता यह पावन जल एक कुंड में रहता है, जिसे बंदरचुंआ कहा जाता है. बंदर आदि पशु-पक्षी इस कुंड से अपनी प्यास बुझाते हैं, वहीं श्रद्धालु इस जल से माँ के चरण पखारते हैं.
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रामनवमी पर लगता है विशाल मेला
मुख्य मार्ग से सटी इस पहाड़ी पर महादेव सहित जगतजननी एवं श्रीराम-जानकी संग लक्ष्मण जी का भव्य मंदिर बना हुआ है. राम-नवमी के पावन पर्व पर यहां 9 दिनों का विशाल मेला लगता है. जिसमें नवधा रामायण पाठ किया जाता है, वहीं आदिवासी अंचल से उमड़े श्रद्धालुओं के मनोरंजन के लिए मीनी मीना बाजार भी यहां आता रहा है. नजदीक ही चौढ़ा चौक पर काली माता का सिद्ध मंदिर भी है. नवरात्रि में अंचल के हजारों भक्त श्रद्धापूर्वक माता के चरणों में शीश नवाकर अपनी झोलियां भर कर लौटते हैं.







